Success Story: डर मुझे भी लगा फासला देखकर, पर मैं बढ़ता गया रास्ता देखकर, इसी अडिग सोच ने हर्ष दुबे को सात साल तक लगातार SSB की चुनौतियों से लड़ने की ताकत दी. 14वें SSB अटेम्प्ट में रिकमेंड होना उनके लिए सिर्फ एक सफलता नहीं, बल्कि धैर्य, आत्मविश्वास और कभी हार न मानने वाले जज़्बे की जीत थी.
बार-बार की असफलताओं के बावजूद उन्होंने अपने डिफेंस ऑफिसर बनने के सपने को जिंदा रखा और साबित कर दिया कि निरंतर प्रयास ही असली गेम चेंजर है. सभी डिफेंस एस्पिरेंट्स के लिए उनका साफ संदेश है कि संघर्ष चाहे जितना लंबा हो, अगर मेहनत सच्ची है तो आपका समय जरूर आएगा.
सपने की शुरुआत: गांव से ऑफिसर बनने तक
हर्ष बचपन से पढ़ाई में तेज थे, लेकिन असली चिंगारी तब जली जब उनके पिता ने क्लास 7 में कहा कि हमारे गांव से आज तक कोई ऑफिसर नहीं बना, तुम्हें यह विरासत बदलनी है. यही वाक्य उनके जीवन का मिशन बन गया. कज़न्स को BSF में सेवा करते देख उनका जुनून और बढ़ा और NCC जॉइन करने के बाद उन्हें यकीन हो गया कि Armed Forces ही उनका रास्ता है.
असफलताओं का लंबा दौर और कठिन फैसले
वर्ष 2018 में NDA II से शुरुआत हुई, लेकिन आगे का सफर आसान नहीं था. 7 स्क्रीन आउट और 7 कॉन्फ्रेंस आउट कुल 13 असफल प्रयास रहे. एक स्थिर नौकरी छोड़ना उनके लिए सबसे मुश्किल फैसला था. बिना आय और बिना गारंटी के सिर्फ एक सपने के भरोसे आगे बढ़ना आसान नहीं था. कई बार उनके मन में सवाल उठे क्या मुझसे गलती हो रही है? लेकिन अंदर की आवाज कहती रही तुम्हारा समय आएगा.
20 जून 2025: जब सपना सच हुआ
आखिरकार 20 जून 2025 को जब उनका चेस्ट नंबर पुकारा गया और उन्हें Indian Coast Guard से रिकमेंडेशन मिली, तो सालों का संघर्ष आंसुओं में बदल गया. वह पल सिर्फ जीत का नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की पुनःस्थापना का था.
सफलता का फॉर्मूला: क्या बदला 14वें अटेम्प्ट में?
हर्ष मानते हैं कि कोचिंग और मेंटरिंग महत्वपूर्ण रही, लेकिन असली बदलाव आत्मविश्लेषण से आया. साइक टेस्ट में बेहतर टाइम मैनेजमेंट, जवाबों में स्पष्टता और आत्मविश्वास, GTO टास्क में टीम प्लेयर की भूमिका, लेक्चर रिकॉर्ड कर खुद रिव्यू करना, दोस्तों और मेंटर्स से ईमानदार फीडबैक लेना शामिल रहा. इस बार उनका माइंडसेट अलग था कि यह उनका सर्वश्रेष्ठ प्रयास होगा और वही हुआ.
हर डिफेंस एस्पिरेंट के लिए संदेश
7 साल, 14 SSB अटेम्प्ट, अनगिनत कुर्बानियां लेकिन अंत में जीत हुई. हर्ष की कहानी बताती है कि कड़ी मेहनत, सब्र और निरंतरता कभी व्यर्थ नहीं जाती. अगर आपका लक्ष्य साफ है और इरादा मजबूत, तो सफलता देर से ही सही, जरूर मिलेगी.