नशे की लत इंसान को किस हद तक गिरा सकती है, इसका अंदाजा हाल ही में सामने आई कुछ चौंकाने वाली रिपोर्टों से लगाया जा सकता है. अब लोग केवल शराब, सिगरेट या ड्रग्स तक सीमित नहीं है, बल्कि नशे का ‘किक’ पाने के लिए फ्लेवर्ड कंडोम (Flavored Condoms), छिपकली की पूंछ और खांसी की दवाओं जैसे बेहद घिनौने और खतरनाक विकल्पों का इस्तेमाल कर रहे है. युवाओं के बीच बढ़ता यह ट्रेंड न केवल सामाजिक पतन का संकेत है, बल्कि स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए भी एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है.
पश्चिम बंगाल और देश के कुछ अन्य हिस्सों से आई खबरों के मुताबिक, युवा फ्लेवर्ड कंडोम को घंटों तक गर्म पानी में भिगोकर रखते है. इस प्रक्रिया से कंडोम में मौजूद पॉलीयुरेथेन (Polyurethane) और सुगंधित यौगिक टूटकर पानी में घुल जाते है, जिससे एक नशीला घोल तैयार होता है इस पानी को पीने से व्यक्ति को लंबे समय तक नशा महसूस होता है. विशेषज्ञों का कहना है कि कंडोम को बनाने में इस्तेमाल होने वाले केमिकल जब गर्म पानी के संपर्क में आते है, तो वे जहरीले हो सकते है. इसका सीधा असर फेफड़ों और किडनी पर पड़ता है और लंबे समय तक ऐसा करने से मानसिक संतुलन बिगड़ने के साथ-साथ कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां भी हो सकती है.
नशे का एक और घिनौना रूप छिपकली की पूंछ का इस्तेमाल है. कई इलाकों में लोग छिपकली की पूंछ को सुखाकर उसे पीस लेते हैं और तंबाकू या सिगरेट के साथ मिलाकर पीते है. छिपकली की पूंछ में कुछ ऐसे न्यूरोटॉक्सिन्स (Neurotoxins) पाए जाते है, जो दिमाग को सुन्न कर देते है और मतिभ्रम (Hallucination) पैदा करते है, यह नशा इतना घातक है कि इससे व्यक्ति को पैरालिसिस (लकवा) मार सकता है या उसकी तत्काल मृत्यु भी हो सकती है इसके अलावा, व्हाइटनर सूंघना, नेल पॉलिश रिमूवर और कफ सिरप का अत्यधिक सेवन भी युवाओं को खोखला कर रहा है.
इन अजीबोगरीब और ‘डिस्गस्टिंग’ तरीकों के साइड इफेक्ट्स रोंगटे खड़े कर देने वाले है. इन रसायनों के सेवन से शरीर का केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है. इससे याददाश्त जाना, लगातार चक्कर आना, दिल की धड़कन का अनियमित होना और लिवर डैमेज होना आम बात है. डॉक्टरों की मानें तो कंडोम वाले पानी या छिपकली के जहर का नशा करने वाले व्यक्ति के बचने की संभावना बहुत कम होती है क्योंकि ये पदार्थ मानव शरीर के लिए बने ही नहीं है. समाज में फैल रही इस विकृति को रोकने के लिए जागरूकता और सख्त निगरानी की सख्त जरूरत है.