Friend vs Disciplinarian: बैडमिंटन की दिग्गज खिलाड़ी साइना नेहवाल ने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में बच्चों की परवरिश को लेकर बड़ा बयान दिया है. उनका कहना है कि कहा कि बच्चों से जितना हो सके आप, दोस्तों के तरह न रहे, उनके साथ सख्त रहे थोड़ा बहुत. साइना नेहवाल ने कहा, ‘अपना दिखाएं कि आप माता-पिता हैं, और कितना उनको आप थोड़ा बहुत कंट्रोल में रख सकते हैं. आप सोचिए कि मेरे माता-पिता दोस्त जैसे हों, तो क्या मैं ओलंपिक का सपना देख सकता हूं.” या मंच का सपना देख सकती हो?’
वर्तमान में ज्यादातर लोग ज्यादा प्यार-दुलार के साथ अपने बच्चों की परवरिश करते हैं, जबकि साइना नेहवाल का दृष्टिकोण इससे काफी अलग है. साइना नेहवाल का मानना है कि बच्चों की परवरिश की कुंजी सख्त प्यार और भरोसे का संतुलित मिश्रण (Balanced Mixture) है. साइना नेहवाल के इस बयान से सवाल उठता है कि क्या माता-पिता को अपने बच्चों के साथ दोस्त बनकर रहना चाहिए या फिर अनुशासित तरीके से उनकी परवरिश करनी चाहिए.
कुछ बच्चों के लिए सख्ती जरूरी?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आकाश हेल्थकेयर में मनोचिकित्सा विभाग की एसोसिएट कंसल्टेंट डॉ. पवित्रा शंकर का कहना है कि ‘सख्त पालन-पोषण हर समस्या का एक जैसा समाधान नहीं है. इसका प्रभाव बच्चे के स्वभाव, विकास के चरण और भावनात्मक वातावरण पर बहुत हद तक निर्भर करता है.’ डॉ. शंकर ने बताया कि साइना नेहवाल का पालन-पोषण व्यवस्थित दिनचर्या (Organized Routine) और स्पष्ट अपेक्षाओं के हिसाब से हुआ था. इन चीजों को उनकी सहनशीलता और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का श्रेय दिया जाता है. हालांकि वे इस अनुभव को हर जगह लागू करने से लोगों को रोक रही हैं. उन्होंने बताया कि ‘जो बच्चे स्वभाव से लक्ष्य-उन्मुख या सहनशील होते हैं, वे सख्त सीमाओं के भीतर अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं. हालांकि, संवेदनशील या चिंताग्रस्त बच्चों के लिए यही सख्ती अत्यधिक दबाव का कारण बन सकती है.’
डॉ. शंकर का कहना है कि छोटे बच्चों को स्नेह और आश्वासन के साथ-साथ सीमाएं भी चाहिए होती हैं. वहीं दूसरी ओर, किशोरों को अनुशासन और स्वायत्तता के बीच एक नाजुक संतुलन की आवश्यकता होती है. डॉ. शंकर ने कहा, ‘जब नियम उम्र के साथ नहीं बदलते, तो सख्ती जल्दी ही नियंत्रण में बदल सकती है.’
साइना नेहवाल का बयान
साइना नेहवाल का कहना है कि पालन-पोषण का मतलब हमेशा दोस्त बनना नहीं होता. उनका मानना है कि कम उम्र में अनुशासन से जीवन में एक ढांचा और लक्ष्य-केंद्रितता विकसित होती है. साइना के माता-पिता सहायक होने के साथ-साथ दृढ़ भी थे. उन्होंने नियमित दिनचर्या बनाई, कोचों का सम्मान किया और खेल के साथ-साथ शिक्षा को भी महत्व दिया. इस संतुलन ने उन्हें बाद में जीवन में दबावों का सामना करने में मदद की. उनके दृष्टिकोण से दोस्ती बाद में भी हो सकती है, लेकिन पहले मार्गदर्शन आना चाहिए.
क्या सख्त पालन-पोषण का तरीका पुराना हो चुका है?
मनोवैज्ञानिक रिचर्स की मानें, तो सख्ती से कुछ समय के लिए रिजल्ट मिल सकते हैं, लेकिन डर का इस्तेमाल करने वाली सख्ती लंबे समय में हानिकारक साबित हो सकती है. इससे बाद में जीवन में चिंता, बचाव कठिनाई हो सकती है. सख्त तरीके से पालन-पोषण करना काफी हद तक बच्चे के स्वभाव और विकास के चरण पर निर्भर करती है. यह तरीका हर बच्चे पर लागू नहीं किया जा सकता है. वर्तमान में सख्त परवरिश पुरानी नहीं हुई, लेकिन इसकी
परिभाषा बदल दी गई है. बच्चों को अभी भी स्पष्ट मार्गदर्शन और सीमाएं (boundaries) की आवश्यकता होती है. एक दोस्त की भूमिका वैसी सीमाएं तय नहीं कर सकती हैं, जितनी प्रभावी माता-पिता की होती है.
क्या होता है सख्त प्यार?
सख्त प्यार का मतलब यह नहीं होता है कि बच्चे के साथ क्रूरता की जाए. इसका मतलब है बच्चे के साथ भरोसे का रिश्ता बनाते हुए उसे सही रास्ता पर लाने के लिए दृढ़ता दिखाई जाए. बच्चों के साथ मिलकर काम करना और उन्हें पढ़ाई और जीवन के अन्य पहलुओं के बारे में समझाना उनके भरोसे को हासिल करने में मदद करता है. बच्चों की उम्र के साथ-साथ परवरिश का तरीका भी बदलना चाहिए. वरना बच्चों पर की जाने वाली सख्ती कंट्रोल में बदल सकती है. इससे बच्चे के विकास पर बुरा असर पड़ सकता है.
साइना से क्या सीख सकते हैं माता-पिता?
साइना नेहवाल का कहना है कि बच्चों से जितना हो सके, दोस्तों की तरह न रहें. उनके अनुभव से आजकल के माता-पिता बहुत कुछ सीख सकते हैं. जैसे कि साइना के अनुभव से पता चलता है कि कभी-कभी स्पष्ट अनुशासन बच्चे के जीवन में दिशा तय करने में मदद कर सकता है, जिससे उन्हें सही-गलत की समझ मिलती है. इसके अलावा माता-पिता को अपने बच्चों के प्रति समर्पित होना चाहिए. माता-पिता को अपने बच्चों को उनके लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, फिर चाहे इसके लिए थोड़ा कठोर ही क्यूं ने बनना पड़े.