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Sound Mark: किंगफिशर जिंगल से नेटफ्लिक्स ‘ता-दम’ तक: ऑडियो लोगो और कानूनी सुरक्षा क्या है

Sound Mark: साउंड मार्क ब्रांड की ध्वनि पहचान होती है, जैसे जिंगल या रिंगटोन होता है. जैसे नोकिया रिंगटोन, आईफोन. जानें क्यों ब्रांड इसे पंजीकृत कराते हैं और कानूनी सुरक्षा कैसे मिलती है.

Written By: Vipul Tiwary
Last Updated: February 24, 2026 13:06:30 IST

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Sound Mark: कोई  ब्रांड हमेशा लोगो के माध्यम से ही अपनी बात नहीं रखता है. कभी-कभी, यह साउंड के जरिए भी अपनी पहचान रखता है. किंगफिशर का फेमस जिंगल ‘ऊ ला ला ला ले ओ’ को इस महीने की शुरुआत में साउंड मार्क के रूप में पंजीकृत कराया गया है. साउंड मार्क एक नॉन कन्वेंशनल ट्रेडमार्क होता है जिसमें ध्वनि को स्रोत पहचानकर्ता के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. लोगो या डिजाइनों के बदले, यह एक श्रव्य संकेत होता है जो उपभोक्ता को बताता है कि कोई विशेष उत्पाद या सेवा किसका है.

सबसे पहला साउंड मार्क

भारत का सबसे पहला पंजीकृत साउंड मार्क 2008 में याहू के “योडल” को ट्रेडमार्क रजिस्ट्री द्वारा स्वीकार किया गया था. बाद में आईसीआईसीआई बैंक ने अपना कॉर्पोरेट जिंगल लिया. नेटफ्लिक्स के “ता-दम” से लेकर नोकिया के स्टार्टअप ट्यून तक, कुछ ध्वनियाँ तुरंत याद आ जाती हैं. ट्रेडमार्क कानून इसको मान्यता देता है. भारत में, ऐसे ऑडियो पहचानकर्ताओं को पंजीकृत कर सकते हैं.

30 सेकंड से ज्यादा नहीं होता

ट्रेड मार्क्स नियम, 2017 नियम 26(5) में यह बताता है कि साउंड ट्रेडमार्क के लिए आवेदन MP3 प्रारूप में 30 सेकंड से ज्यादा लंबाई का नहीं होना चाहिए, जिसे ऐसे माध्यम पर रिकॉर्ड किया गया हो जो आसान से और स्पष्ट तरीके से सुना जा सके को अनुमति देता हो, साथ ही यह नोटेशन का ग्राफिकल भी हो.

साउंड मार्क बताना जरूरी

2017 से पहले, आवेदक मुख्य रूप से लिखित विवरण या शीट संगीत पर निर्भर रहते थे. इसमें आवेदक को आवेदन में स्पष्ट बताना होता है कि चिह्न एक साउंड मार्क है. नहीं तो रजिस्ट्री द्वारा इसे शब्द या प्रतीक चिह्न के रूप में माना जा सकता है.

वैधता 10 साल तक

आवेदक फॉर्म  TM-A भरता है, जिसमें चिह्न को ध्वनि चिह्न के रूप में पहचाना जाता है और संबंधित वस्तुओं या सेवाओं की श्रेणी निर्दिष्ट की जाती है. आवेदन के साथ एमपी3 फाइल और संगीत भी जमा होता हैं. आवेदक का नाम, पता, कानूनी स्थिति और प्रथम उपयोग की तिथि जैसी जानकारी भी देना जरूरी होता है. एक ट्रेडमार्क आमतौर पर 10 साल तक वैध रहता है और इसे कई बार रिन्यू किया जा सकता है.

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