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वैलेंटाइन वीक में क्यों छाया है ‘6-7 डेटिंग’ ट्रेंड? Gen Z का नया रिलेशनशिप फॉर्मूला, जानिए इसका मतलब

6-7 Dating: जेनरेशन Z की डेटिंग भाषा में '6-7' शब्द का क्या मतलब है? इन दिनों वैलेंटाइन वीक के दौरान ये इंटरनेट पर छाया हुआ है. चलिए जानते हैं इसके बारे में सबकुछ.

Written By: Kamesh Dwivedi
Last Updated: February 12, 2026 10:20:20 IST

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What is 6-7 Dating: जेन Z अब रिश्तों के पुराने तरीकों को अलग ढंग से देख रही है. 6-7 डेटिंग इसका नया उदाहरण है. आज के समय में डेटिंग ऐप्स, भागदौड़ भरी जिंदगी और भावनात्मक दबाव के बीच युवा अपने हिसाब से रिश्तों को समझ और जी रहे हैं. पहले की तरह रिश्तों को नाम देने या हर समय बात करते रहने की जगह, 6-7 डेटिंग में सीमित और सोच-समझकर जुड़ाव पर जोर दिया जाता है. इसका मतलब है कम मुलाकातें, कम बातचीत, लेकिन साफ इरादों के साथ रिश्ता. चलिए जानते हैं आखिर क्या होता है 6-7 डेटिंग. 

6-7 डेटिंग क्या है?

6-7 डेटिंग एक नया और दिलचस्प रिलेशनशिप ट्रेंड है. इसमें दो लोग पूरे दिन एक-दूसरे से चिपके नहीं रहते, बल्कि रोज शाम 6 से 7 बजे के बीच खास तौर पर एक-दूसरे के लिए समय निकालते हैं. इस दौरान वे कॉल, मैसेज या छोटी-सी मुलाकात के जरिए जुड़ते हैं. यानी यह रिश्ता 24 घंटे की बातचीत पर नहीं, बल्कि तय और खास एक घंटे की कनेक्शन पर टिका होता है. कम समय, लेकिन पूरा ध्यान और सच्चा जुड़ाव, यही है 6-7 डेटिंग की खासियत. इस माध्यम से पार्टनर एक-दूसरे को धीरे-धीरे समझने का प्रयास करते हैं. 

यह ये भी कहता है कि आपको 10 में से 10 नंबर का साथी तो नहीं मिल सकता, लेकिन असल जिंदगी में आपको 6 या 7 नंबर (रेटिंग) का साथी जरूर मिल सकता है, जो भावनात्मक रूप से शांत हो और हमेशा आपके लिए उपलब्ध रहे. यह Gen Z पीढ़ी द्वारा गढ़ा गया एक शब्द है, क्योंकि वे 6-7 के पैमाने पर ऐसे वास्तविक रिश्ते तलाशना चाहते हैं जो स्थिरता, भावनात्मक परिपक्वता, शांति, दयालुता, विश्वसनीयता और आराम का वादा करते हों. 

क्या ये सिनेमैटिक रोमांस का अंत है?

6-7 डेटिंग ट्रेंड Gen Z की संतुलन की चाहत को दर्शाता है. यह बताता है कि रोमांस के लिए हमेशा बड़े-बड़े प्रयास या लगातार संपर्क में रहना जरूरी नहीं होता. कभी-कभी थोड़े समय के लिए लगातार मौजूद रहना भी उतना ही सार्थक हो सकता है.

युवाओं में इसका ट्रेंड क्यों बढ़ रहा है?

6-7 एक ऐसा शब्द है जो आजकल TikTok, Instagram और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर खूब ट्रेंड कर रहा है. आज की Gen Z पिछली पीढ़ियों से काफी अलग सोच रखती है. यह पीढ़ी अपनी सीमाओं और मानसिक स्वास्थ्य को सबसे ज्यादा महत्व देती है. पढ़ाई का दबाव, अतिरिक्त काम और लगातार मोबाइल-सोशल मीडिया पर रहने से होने वाली डिजिटल थकान के बीच हर समय उपलब्ध रहना आसान नहीं होता. ऐसे में ‘6-7 डेटिंग’ जैसा कॉन्सेप्ट उन्हें संतुलन देता है. इसमें पूरा दिन एक-दूसरे में उलझे रहने के बजाय, एक तय समय पर जुड़ाव होता है. इससे रिश्ता भी बना रहता है और भावनात्मक बोझ भी नहीं बढ़ता. न ज्यादा दखल, न अनावश्यक अपेक्षाएं—बस सुकून भरा जुड़ाव. यह ट्रेंड दिखावटी और ओवर-ड्रामेटिक रोमांस से हटकर, शांत, समझदार और उद्देश्यपूर्ण रिश्तों की ओर बढ़ते कदम को भी दर्शाता है. इसी वजह से ये पारंपरिक डेटिंग से अलग हो जाता है. 

क्या हैं इसके फायदे और नुकसान?

फायदे

6-7 डेटिंग कहती है कि प्यार सिर्फ जोश या अचानक उठी भावनाओं का नाम नहीं है. असली रिश्ता बातचीत, एक जैसे मूल्यों और एक-दूसरे के साथ लगातार खड़े रहने से बनता है. रिश्ते हमेशा खुशी और रोमांच से भरे नहीं होते, बल्कि लंबे समय तक चलने के लिए उनमें भावनात्मक संतुलन जरूरी होता है. इसका एक सीधा सा मतलब है—जहां आपसी सम्मान हो, एक-दूसरे के लिए समय और समझ हो, वही रिश्ता टिकता है. अगर कल्पनाओं और फिल्मों जैसे रोमांस को हटा दें, तो रिश्ते को चलाने के लिए तीन चीजें बचती हैं: आपसी तालमेल, लगातार कोशिश और बोरियत या मुश्किल वक्त को बिना हार माने संभालने की क्षमता. इस वजह से डेटिंग का ये तरीका युवाओं को रास आ रहा है. 

नुकसान

इन सब अच्छी बातों के बीच 6-7 डेटिंग ट्रेंड की एक बड़ी कमी भी है. यह लोगों को बहुत आसान और सीमित ढंग से पेश करता है—जैसे दुनिया सिर्फ दो हिस्सों में बंटी हो- या तो ये, या वो. मानो कोई इंसान या तो बहुत आकर्षक होगा या भरोसेमंद. या तो बेहद खूबसूरत होगा या भावनात्मक रूप से समझदार. या तो आपको रोमांच देगा या स्थिरता.

यह सोच रिश्तों को जरूरत से ज्यादा सरल बना देती है. ऐसा लगता है जैसे कोई व्यक्ति अच्छा इसलिए है क्योंकि उसके पास ‘बुरा व्यवहार’ करने की ताकत नहीं है. जैसे अगर कोई बहुत आकर्षक हो जाए, तो वह जरूर बदतमीजी करेगा. लेकिन असल जिंदगी इतनी सीधी नहीं होती. लोग सिर्फ एक गुण से नहीं बनते. कोई इंसान आकर्षक भी हो सकता है और भरोसेमंद भी, उत्साही भी और स्थिर भी. रिश्तों को ‘या तो यह, या वह’ के चश्मे से देखने के बजाय, उन्हें इंसानी जटिलता के साथ समझना ज्यादा सही है.

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