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मेट्रो में सभ्य, बस में धक्का-मुक्की क्यों? अलग-अलग ट्रासपोर्ट सिस्टम में क्यों बदल जाता है लोगों का व्यवहार? इकोनॉमिक सर्वे ने किया खुलासा

Indian Public Transport Behaviour: भारतीय मेट्रो स्टेशनों की कतारों में नियमों का पालन क्यों करते हैं, लेकिन बसों और ट्रेनों के लिए धक्का-मुक्की करते हैं, सामान छीनते हैं और लाइन तोड़ते हैं? भारतीय अलग-अलग पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम में अलग तरह से व्यवहार क्यों करते हैं? इकोनॉमिक सर्वे ने इस व्यवहार के अंतर को 5 जवाबों के साथ समझाया है.

Written By: Shristi S
Last Updated: 2026-01-31 16:15:09

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Public Transport Behaviour Gap: लोगों को हमेशा हमने देखा है कि जब भी मेट्रो स्टेशनों, एयरपोर्ट या किसी पासपोर्ट पर लाइन में लगने की बात आती है, तब वह धैर्य से अपने नंबर आने का इंतजार करते है, लेकिन वहीं जब बात बस स्टॉप पर लाइन की बात आती है तो लोग धक्का-मुक्की कर सड़क पर ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ा देते है और लाइन तोड़ बस में चढ़ जाते है. इसी कड़ी में इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 इस जानी-पहचानी पहेली को सीधे तौर पर सुलझाता है. यह तर्क देते हुए कि लोगों का व्यवहार संस्कृति या नागरिक भावना से कम और संदर्भ, डिज़ाइन और संस्थानों में विश्वास से ज़्यादा जुड़ा होता है. इकोनॉमिक सर्वे 2026 “संदर्भित अनुपालन” का विचार पेश करता है ताकि यह समझाया जा सके कि कुछ सार्वजनिक प्रणालियों में व्यवस्थित व्यवहार क्यों उभरता है लेकिन दूसरों में क्यों बिगड़ जाता है.

भारतीय अलग-अलग पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम में अलग-अलग तरह से व्यवहार क्यों करते हैं?

सबसे पहले सवाल खड़ा होता है कि भारतीय अलग-अलग पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम में अलग-अलग तरह से व्यवहार क्यों करते हैं? तो इस सवाल के जवाब में सर्वे में कहा गया है कि एक संदर्भ में जो व्यवहार अव्यवस्थित या आम लोगों के प्रति उदासीन लगता है वही दूसरे संदर्भ में व्यवस्थित, विचारशील और नियमों का पालन करने वाला बन जाता है. अक्सर उसी शहर में, उसी वर्ग के उपयोगकर्ताओं के बीच, यहां तक कि उन्हीं व्यक्तियों में भी,” मेट्रो रेल सिस्टम और मुंबई BEST बस सेवा को इसके उदाहरण के तौर पर बताया गया है.

इकोनॉमिक सर्वे ने 5 जवाबों के साथ बिहेवियर गैप को समझाया 

1. सिस्टम को स्पष्ट रूप से डिज़ाइन किया जाना चाहिए ताकि “सही व्यवहार” क्या है, इसके बारे में अस्पष्टता कम हो. परिवहन प्रणाली में उचित प्रवेश और निकास लाइनें, बैरियर, टर्नस्टाइल, चिह्नित कतारें, प्लेटफॉर्म के दरवाज़े या पेंट किए हुए बे होने चाहिए. सर्वे कहता है कि जब माहौल व्यवस्था का संकेत देता है, तो लोग आमतौर पर उसका पालन करते हैं; जब जगह अस्पष्ट होती है, तो वे खुद ही रास्ता निकालते हैं, और भीड़भाड़ वाली जगहों पर खुद से रास्ता निकालना अक्सर अराजकता जैसा लगता है.

2. यात्री नियमों के किसी न किसी तरह के प्रवर्तन की उम्मीद करते हैं, भले ही वह हल्का-फुल्का ही क्यों न हो. मेट्रो में, कर्मचारियों की उपस्थिति, जुर्माना और निगरानी एक पृष्ठभूमि ‘अधिकार की छाया’ बनाती है. लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रवर्तन लगातार और निष्पक्ष होता है, जैसा कि कई अन्य सार्वजनिक जगहों पर नहीं होता, जहां यह असमान या बातचीत से तय होने वाला होता है. जहां नियम निष्पक्ष और अनुमानित लगते हैं, वहाँ अनुपालन को आंतरिक बनाना आसान हो जाता है, यह कहता है.

3. सेवा की विश्वसनीयता होनी चाहिए. सर्वे में कहा गया है कि अगर ट्रेनें रेगुलर इंटरवल पर आती हैं और सभी को पता है कि इंतज़ार का समय एक या दो मिनट है, तो धक्का-मुक्की, छीना-झपटी या लाइन तोड़ने जैसी हरकतें कम होंगी. लेकिन अगर यात्रियों को लगातार देरी, अनियमित सर्विस और अप्रत्याशित ट्रैफिक का सामना करना पड़ता है, तो वे मौके का फायदा उठाने लगते हैं क्योंकि सिस्टम पर से उनका भरोसा उठ जाता है कि धैर्य रखने वालों के साथ सही व्यवहार होगा.

4. लोग एक स्थिर सिस्टम में दूसरे लोगों से सीखते हैं और यहां तक ​​कि साथी यात्री भी गलत व्यवहार पर आपत्ति जताते हैं. जब लोग देखते हैं कि दूसरे लोग लाइन में लगते हैं, जगह देते हैं, या दरवाज़े ब्लॉक करने से बचते हैं, तो अनुरूपता अव्यवस्था के बजाय व्यवस्था की ओर बढ़ने लगती है. मेट्रो का ‘अंदर का व्यवहार’ एक सोशल स्क्रिप्ट बन जाता है, नियमों का उल्लंघन करने पर न सिर्फ अधिकारियों बल्कि साथी यात्रियों से भी नाराज़गी मिलती है.

5. इकोनॉमिक सर्वे लोगों के लिए एक सम्मानजनक पब्लिक स्पेस बनाने की बात करता है. इसमें कहा गया है कि जब ऐसे स्पेस खराब हालत में होते हैं, ठीक से मेंटेन नहीं होते या स्वार्थी लोगों के कब्ज़े में होते हैं, तो लोगों को उनकी देखभाल करने की कोई ज़िम्मेदारी महसूस नहीं होती. इस तरह, लापरवाही से और लापरवाही बढ़ती है. मेट्रो आधुनिकता, दक्षता और नागरिक गौरव का प्रतीक बन गई है; यूज़र्स इसे एक उपेक्षित पब्लिक यूटिलिटी के बजाय एक मूल्यवान संपत्ति के रूप में देखते हैं.

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