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भारत में शादी को लंबे समय तक सही उम्र से जोड़कर देखा जाता रहा है. लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है. युवा पहले करियर, आर्थिक स्थिरता और व्यक्तिगत अनुकूलता को प्राथमिकता दे रहे हैं. अब सवाल उठ रहा है कि क्या भारत में देर से शादी का दौर शुरू हो चुका है? आइए जानते हैं, आंकड़े क्या कहते हैं.
आंकड़े क्या बताते हैं?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक ताजा रिपोर्ट यह बताते हैं कि महिलाओं और पुरुषों दोनों की औसत विवाह करने की आयु में धीरे-धीरे बढ़ोतरी दर्ज की गई है. खासकर शहरी इलाकों में यह बदलाव ज्यादा स्पष्ट देखने को मिलता है. उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ युवाओं की रोजमर्रा की प्राथमिकताएं भी बदल रही है.
युवा इसे व्यक्तिगत निर्णय के रूप में देख रहे
वहीं, एक रिसर्च में पाया गया है कि पहले युवा इसे सामाजिक दबाव के रूप में देखते थे लेकिन अब भारतीय युवा इसे व्यक्तिगत निर्णय के रूप में देख रहे हैं. स्टडी के मुताबिक आर्थिक स्थिरता, व्यवसायिक पहचान और मानसिक अनुकूलता अब विवाह के प्रमुख कारक बन गये हैं.
बेरोजगारी सहित आर्थिक बदलाव पारंपरिक विवाह
टेक्सास विश्वविद्यालय, ऑस्टिन की बासु और सह-लेखिका स्नेहा कुमार ने भारतीय राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण किया और इस बारे में पता चला कि बेरोजगारी सहित आर्थिक बदलाव पारंपरिक विवाह प्रथाओं में अनुकूलन के लिए मजबूर कर रहे हैं. जिससे पुरुषों को शादी के लिए ज्यादा देर तक इंतजार करना पड़ रहा है और कभी-कभी इसके लिए भुगतान भी करना पड़ रहा है.
महिलाओं को लंबे समय में फायदा
उन्होंने यह भी बताया कि अविवाहित पुरुष परेशानी खड़ी कर सकते हैं, लेकिन देर से शादी की वजह से महिलाओं को लंबे समय में फायदा हो सकता है, इससे देर से शादी करने पर महिलाएं अधिक शिक्षित हो सकती हैं.
पुरुषों को शादी करने और परिवार बसाने के लिए पैसे की जरूरत नहीं
समाजशास्त्री और जनसांख्यिकीविद् अलका मालवाडे बसु ने बताया कि दुनिया के कई हिस्सों में बेरोजगारी और देर से शादी करना आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. लेकिन भारत में इस संबंध का विशेष महत्व है, जहां परंपरागत रूप से पुरुषों को शादी करने और परिवार बसाने के लिए पैसे की जरूरत नहीं लगती है.