बड़ी डिग्री लेने के बाद ज्यादातर युवाओं का सपना होता है कि विदेश जाकर जॉब करें और सेटल हो जाएं. लोगों का मानना है कि विदेश में सैलरी ज्यादा अच्छी होती है, जिससे आसानी से सेटल हुआ जा सकता है, लेकिन असलियत कुछ और ही है. हाल ही में कंटेंट क्रिएटर डोलेश अग्रवाल का एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है, जिसमें जापान में काम करने वाले टेकीज़ की असली कमाई के बारे में बात की गयी है.
इस वीडियो में वो जापान में काम करने वाले दो सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स से बात करते हैं, जिससे यह बात साफ होती है कि वहां नौकरी “सिर्फ़ बड़ा सैलरी पैकेज” वाली स्टोरी नहीं है. दोनों इंजीनियर जापान में सॉफ्टवेयर डेवलपर की जॉब कर रहे हैं और उन्होंने लगभग 3 मिलियन येन से शुरुआती सैलरी की जानकारी दी है, जो भारतीय रुपए में लगभग 17–18 लाख रुपये के बराबर है.
जापान में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की कमाई
वीडियो में डोलेश एक रेस्टोरेंट में जाते हैं और वहां दो सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स से बात करते हैं. जब उन्होंने जापान में इंजीनियर्स की सैलरी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि जापान में शुरुआत में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की सालाना सैलरी लगभग 30 लाख येन तक हो सकती है, जो आज की रुपए‑येन एक्सचेंज रेट पर लगभग 17 लाख रुपये के बराबर है. उन्होंने कहा कि दो से तीन साल का अनुभव होने पर यह आंकड़ा 4.5 से 5 मिलियन येन तक जा सकता है, जो रुपये में लगभग 28–30 लाख रुपये के रेंज में आता है. यह बताते हुए दोनों इंजीनियर्स ने साफ किया कि यह पैकेज लगातार बढ़ता जाता है, लेकिन इसके साथ टैक्स और कॉस्ट ऑफ़ लिविंग भी बहुत ज़्यादा है.
टैक्स और असली “हाथ में आने वाली” रकम में अंतर
इंटरव्यू में दोनों टेकीज ने एक बहुत ज़रूरी बात यह भी बताई कि उनके सालाना इनकम में से लगभग 3 लाख रुपये टैक्स के रूप में कट जाते हैं, जो भारत के मुकाबले कहीं ज़्यादा है. इसका मतलब यह है कि जो फिगर सुनने में “30 लाख सालाना” जैसा लगता है, लेकिन असल में घर आने वाली नेट इनकम कम होती है, क्योंकि येन में कमाई जापानी टैक्स‑सिस्टम और सोशल सिक्योरिटी स्कीम पर टैक्स होता है. कई इंडियन यूजर्स ने सोशल मीडिया पर इस बात पर चर्चा की है कि जापान में महंगी लाइफ‑स्टाइल, घर‑किराया, ट्रांसपोर्ट और खान‑पान की कीमतों के साथ यह नेट इनकम कितना “हैवी” लगता है.
जापानी वर्क कल्चर और चुनौतियां
इन बेंगलुरु टेकीज ने साफ किया कि जापान में काम करने के पीछे सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि बहुत सख्त वर्क कल्चर भी है. लंबे आफिस आवर्स, हाई प्रेशर एन्वायरनमेंट और कंपनी‑सेंट्रिक लाइफस्टाइल उनके लिए चुनौती है, जिससे भारत में रहकर यह जानकारी समझना आसान नहीं होता. फिर भी, दोनों ने माना कि जापानी सिस्टम अच्छी वर्क–लाइफ बैलेंस और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर देता है, बस उसकी कीमत टैक्स और थोड़ी ज़्यादा टेंशन के रूप में भी चुकानी पड़ती है.