Carrot Trick: हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो देखने को मिला, जिसमें कुछ आसान मैथमेटिकल जोड़ दिखाए गए. इसके बाद लोगों से उस सब्जी का नाम पूछा गया, तो लगभग 90 फीसदी लोगों ने एक जैसा जवाब दिया. इंस्टाग्राम रील के मुताबिक, लगभग 90 परसेंट लोग ‘गाजर’ चुनते हैं. इसमें लिखा था, ‘इस घटना को प्राइमिंग कहते हैं. ये तब होती है, जब दिमाग पर हल्का सा असर होता है या वो किसी खास रिस्पॉन्स के लिए तैयार होता है. इस मामले में आसान मैथमेटिकल कैलकुलेशन करने से दिमाग एक सीधी और पारंपरिक सोच की ओर बढ़ता है, जिससे ज्यादातर लोग गाजर चुनते हैं.
हालांकि दूसरी सब्जी का नाम चुनना इंडिपेंडेंट सोच दिखाती है. इससे कॉग्निटिव फ्लेक्सिबिलिटी और मजबूत ऑटोनॉमस डिसीजन-मेकिंग दिखती है, जो लीक से हटकर सोचने के बजाय नई राह दिखा सकती है. इस तरह की ट्रिक्स हमें दिखाती हैं कि हम फैसले कैसे लेते हैं? इसके बाद बाहरी दबाव और हमारी सोच धीरे-धीरे हमारे विचारों को बदल देते हैं.
दिमाग में बीज बोकर काम करती है ट्रिक
इस बारे में डॉ. चांदनी तुगनेट, MD (A.M.), साइकोथेरेपिस्ट, कोच व हीलर और गेटवे ऑफ हीलिंग की फाउंडर और डायरेक्टर ने इस बारे में बताया. उन्होंने कहा कि असल में ये टेक्निक पार्टिसिपेंट के कोई भी फैसला लेने से पहले उसके दिमाग में एक बीज बोकर काम करती है. उन्होंने कहा कि ‘शब्दों, तस्वीरों, इशारों या आवाज के टोन जैसे हल्के इशारों से सबकॉन्शियस को किसी खास नतीजे की ओर धकेला जाता है. हैरानी की बात ये है कि लोगों को इसके बारे में पता तक नहीं चलता. ये टेक्निक दिमाग की शॉर्टकट लेने की आदत का फायदा उठाती है और सबसे नई या सबसे खास जानकारी के आधार पर फैसले लेती है.’
अनुभव के आधार पर खाली जगह भरता है दिमाग
डॉक्टर तुगनेट ने कहा कि इस ट्रिक का एक खास हिस्सा उम्मीद और असर है. इसे करने वाला व्यक्ति ध्यान से यह एहसास दिलाता है कि यह जरूरी है. इससे आखिरी फैसला ऐसा लगे कि यह अपने आप हो गया है. इसमें किसी को पहले से ही किसी खास नंबर, रंग या चीज के बारे में धीरे से बताकर उसकी ओर गाइड करना शामिल हो सकता है. इंसान पैटर्न को पहचानने के लिए तैयार होते हैं, भले ही उन्हें इसके बारे में पता न हो. जब कोई ऐसा फैसला दिया जाता है जिसमें कुछ साफ न हो, तो दिमाग अपने आप वैसी ही चीजों के पहले के अनुभव के आधार पर खाली जगह भर देता है.
क्यों असरदार है ट्रिक
उन्होंने बताया कि यह ट्रिक इतनी असरदार है क्योंकि यह असल में माइंड-रीडिंग पर निर्भर नहीं करती बल्कि कॉग्निटिव बायस और फैसले लेने के शॉर्टकट में हेरफेर करती है. यह खुले और रिस्पॉन्सिव लोगों पर सबसे अच्छा काम करती है क्योंकि शक या एक्टिव विरोध असर के बहाव को रोक सकता है. हल्की बॉडी लैंग्वेज और आवाज का उतार-चढ़ाव इसमें अहम भूमिका निभाता है क्योंकि लोग अनजाने में इन इशारों को दिखाते हैं या उन पर रिएक्ट करते हैं, जिससे मनचाहा नतीजा और पक्का हो जाता है.
अलग-अलग फील्ड में होता है इस्तेमाल
मनोरंजन के अलावा इन साइकोलॉजिकल तकनीकों के अलग-अलग फील्ड में प्रैक्टिकल इस्तेमाल हैं. डॉ. टुगनेट के अनुसार, मार्केटिंग और सेल्स में, प्राइमिंग का इस्तेमाल कंज्यूमर के व्यवहार पर असर डालने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है, चाहे वह खास रंगों के चुनाव, स्लोगन या प्रोडक्ट प्लेसमेंट के ज़रिए हो. बातचीत और मनाने में, इन सिद्धांतों को समझने से लोगों को किसी खास नतीजे पर ले जाने के लिए बातचीत को आकार देने में मदद मिल सकती है. पर्सनल लेवल पर पॉजिटिव अफरमेशन और विज़ुअलाइज़ेशन जैसी तकनीकें समय के साथ मनचाही मान्यताओं को मज़बूत करके सफलता के लिए मन को तैयार करने के उन्हीं तरीकों पर निर्भर करती हैं.