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इस Viral Painting ने इंटरनेट पर क्यों छेड़ दी बहस, जानें भ्रम और मन के पीछे का खेल?

Viral Painting Sparks Debate: एक हल्की रोशनी वाली पेंटिंग इंटरनेट पर काफी वायरल हो रही है. जब आप इसे पहली बार देखते हैं, तो यह सिर्फ़ एक नॉर्मल आर्टवर्क लगता है. हल्की परछाइयों और सॉफ्ट टेक्सचर वाला एक मूडी लैंडस्केप जैसा दिखता है.

Written By: Pushpendra Trivedi
Last Updated: February 8, 2026 13:03:26 IST

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Viral Painting Sparks Debate: एक हल्की रोशनी वाली पेंटिंग इंटरनेट पर काफी वायरल हो रही है. ऑप्टिकल इल्युजन वाली फोटो को जब आप इसे पहली बार देखते हैं, तो यह सिर्फ़ एक नॉर्मल आर्टवर्क लगता है. हल्की परछाइयों और सॉफ्ट टेक्सचर वाला एक मूडी लैंडस्केप जैसा दिखता है. इसलिए, इसमें कुछ भी अजीब नहीं है. लेकिन थोड़ी देर और देखें, खासकर देर रात में और कई दर्शक जोर देकर कहते हैं कि अंधेरे से धीरे-धीरे एक इंसान का चेहरा उभरता है. सोशल मीडिया पर कमेंट्स में  ‘मैं इसे अनदेखा नहीं कर सकता’ से लेकर ‘यह डरावना है’ तक हैं. हालांकि, न्यूरोसाइंटिस्ट शांति से वही बात कह रहे हैं.वहां असल में कोई चेहरा नहीं है.

लेकिन लोगों को कुछ और ही दिख रहा है?

इसका जवाब पैरेडोलिया नाम की एक जानी-मानी घटना में छिपा है. यह आपके दिमाग की बेतरतीब या अस्पष्ट चीज़ों में मतलब वाले पैटर्न, खासकर चेहरों को पहचानने की आदत है. यही वजह है कि आप बादलों, बिजली के आउटलेट या कारों के सामने चेहरों को देख सकते हैं. विकास के नज़रिए से यह पूरी तरह से समझ में आता है. शुरुआती इंसान जो चेहरों को जल्दी पहचान सकते थे, असली चेहरे को पहचानने से चूकना, गलती से चेहरा देखने से कहीं ज़्यादा खतरनाक था. यह पेंटिंग हल्के ग्रेडिएंट, सिमेट्रिकल परछाइयां और संकेत देने वाले कंटूर दिमाग को खाली जगह भरने के लिए काफी जानकारी देते हैं और नतीजा क्या होता है? एक ऐसा चेहरा जो जीवंत और असली लगता है. भले ही वह असल में वहां न हो. 

इससे थकान का क्या लेना-देना है?

कुछ दर्शक कहते हैं कि आधी रात के बाद या लंबे समय तक स्क्रॉल करने के सेशन के दौरान चेहरा और भी साफ दिखाई देने लगता है. मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं है. जब आप नींद पूरी नहीं करते या मानसिक रूप से थके होते हैं, तो आपका दिमाग शॉर्टकट पर बहुत ज़्यादा निर्भर करने लगता है. ध्यान से एनालिसिस करने के बजाय जल्दी-जल्दी अंदाज़ा लगाना. विज़ुअल प्रोसेसिंग ज़्यादा शोर वाली हो जाती है और आपका दिमाग धुंधली तस्वीरों पर जानी-पहचानी आकृतियों को थोपने लगता है. दूसरे शब्दों में आप कह सकते हैं कि थकान पैरेडोलिया की आवाज़ बढ़ा देती है. आपका दिमाग बेहतर नहीं देख रहा है. वह ज्यादा अंदाज़ा लगाने लगता है.

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भावनाएं भी हैं फैक्टर

साथ ही भावनाओं का भी बड़ा रोल होता है. जब कोई कहता है कि इस पेंटिंग में एक डरावना चेहरा छिपा है, तो आपका दिमाग अपने आप उसे ढूंढने के लिए तैयार हो जाता है. एक बार जब वह उस विचार की पुष्टि कर लेता है, तो चेहरा आपके सामने दिखाई देगा. इससे उसे अनदेखा करना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि अब उसके पास दोबारा इस्तेमाल करने के लिए एक टेम्प्लेट है. यही वजह है कि यह इल्यूजन ऑनलाइन इतनी तेजी से फैलता है. हर शेयर, कैप्शन या कमेंट अगले दर्शक को धीरे-धीरे बताता है कि क्या देखना है. दिमाग की इमेजिंग पर की गई स्टडीज़ से पता चलता है कि अस्पष्ट तस्वीरें असली चेहरों की तरह ही चेहरे पहचानने वाले एरिया को एक्टिवेट करती हैं. भले ही वहां कोई चेहरा न हो. पेंटिंग में भूत नहीं है, आपका विज़ुअल कॉर्टेक्स बस अपना काम थोड़ा ज़्यादा जोश से कर रहा है. 

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Written By: Pushpendra Trivedi
Last Updated: February 8, 2026 13:03:26 IST

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