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सब जाते हैं पूरब तो ये जाती है पश्चिम, विपरीत दिशा में क्यों प्रवाहित होती है नदी? कारण जानकार हो जाएंगे हैरान

भारत की एक ऐसी नदी भी है, जो पूर्व से पश्चिम की बजाय विपरीत दिशा में बहती है. यह नदी है नर्मदा नदी. मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलकर यह गुजरात के खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में मिलती है, जो अन्य नदियों से अलग व्यवहार प्रदर्शित करती है.

Written By: Shivangi Shukla
Last Updated: March 24, 2026 11:46:38 IST

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भारत की नदियां अपनी पवित्रता, संस्कृति और भौगोलिक महत्व के लिए जानी जाती हैं. इनमें एक ऐसी नदी भी है, जो पूर्व से पश्चिम की बजाय विपरीत दिशा में बहती है. 

यह नदी है नर्मदा नदी. मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलकर यह गुजरात के खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में मिलती है, जो अन्य नदियों से अलग व्यवहार प्रदर्शित करती है. आमतौर पर बाकी नदियां पश्चिम से निकलकर पूर्व की ओर बहती हैं. 

नर्मदा का उद्गम और प्रवाह मार्ग

नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के मैकाल पर्वत श्रेणी में स्थित अमरकंटक से निकलती है, जो समुद्र तल से लगभग 1,048 मीटर ऊंचाई पर स्थित है. इसकी कुल लंबाई 1,312 किलोमीटर है, जो मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर गुजरती है. यह विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के बीच एक संकरी घाटी में बहती है, जिसे रिफ्ट वैली के नाम से जाना जाता है. अधिकांश भारतीय नदियां हिमालय से निकलकर पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, लेकिन नर्मदा पश्चिममुखी है और अर्ब सागर में गिरती है. 

विपरीत बहाव का वैज्ञानिक कारण

नर्मदा के उल्टे बहने का मुख्य कारण भूगर्भीय संरचना है. यह नदी एक रिफ्ट वैली में स्थित है, जो टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल से बनी दरार घाटी है. इस क्षेत्र में भूमि का प्राकृतिक ढलान पूर्व से पश्चिम की ओर है, इसलिए जल प्रवाह भी इसी दिशा में होता है. विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वतों के बीच का यह फॉल्ट क्षेत्र नदी को मजबूती से बांधे रखता है, जिससे यह पूर्व की बजाय पश्चिम की ओर बहती है. यह प्राकृतिक घटना लाखों वर्षों की भू-आकृति विज्ञान की देन है. 

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

नर्मदा को ‘रेवा’ या ‘माता नर्मदा’ कहा जाता है और इसे गंगा से भी अधिक पवित्र माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, नर्मदा नदी भगवान शिव की पुत्री हैं. शिव के मैकाल पर्वत पर तपस्या के दौरान उनके पसीने से उत्पन्न सरोवर से नर्मदा का उद्गम माना जाता है. नर्मदा परिक्रमा एक प्रसिद्ध तीर्थयात्रा है, जिसमें भक्त 3,300 किलोमीटर की पैदल परिक्रमा करते हैं. बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ओंकारेश्वर इस नदी के तट पर स्थित है. 

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भारत की नदियां अपनी पवित्रता, संस्कृति और भौगोलिक महत्व के लिए जानी जाती हैं. इनमें एक ऐसी नदी भी है, जो पूर्व से पश्चिम की बजाय विपरीत दिशा में बहती है. 

यह नदी है नर्मदा नदी. मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलकर यह गुजरात के खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में मिलती है, जो अन्य नदियों से अलग व्यवहार प्रदर्शित करती है. आमतौर पर बाकी नदियां पश्चिम से निकलकर पूर्व की ओर बहती हैं. 

नर्मदा का उद्गम और प्रवाह मार्ग

नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के मैकाल पर्वत श्रेणी में स्थित अमरकंटक से निकलती है, जो समुद्र तल से लगभग 1,048 मीटर ऊंचाई पर स्थित है. इसकी कुल लंबाई 1,312 किलोमीटर है, जो मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर गुजरती है. यह विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के बीच एक संकरी घाटी में बहती है, जिसे रिफ्ट वैली के नाम से जाना जाता है. अधिकांश भारतीय नदियां हिमालय से निकलकर पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, लेकिन नर्मदा पश्चिममुखी है और अर्ब सागर में गिरती है. 

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नर्मदा के उल्टे बहने का मुख्य कारण भूगर्भीय संरचना है. यह नदी एक रिफ्ट वैली में स्थित है, जो टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल से बनी दरार घाटी है. इस क्षेत्र में भूमि का प्राकृतिक ढलान पूर्व से पश्चिम की ओर है, इसलिए जल प्रवाह भी इसी दिशा में होता है. विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वतों के बीच का यह फॉल्ट क्षेत्र नदी को मजबूती से बांधे रखता है, जिससे यह पूर्व की बजाय पश्चिम की ओर बहती है. यह प्राकृतिक घटना लाखों वर्षों की भू-आकृति विज्ञान की देन है. 

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

नर्मदा को ‘रेवा’ या ‘माता नर्मदा’ कहा जाता है और इसे गंगा से भी अधिक पवित्र माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, नर्मदा नदी भगवान शिव की पुत्री हैं. शिव के मैकाल पर्वत पर तपस्या के दौरान उनके पसीने से उत्पन्न सरोवर से नर्मदा का उद्गम माना जाता है. नर्मदा परिक्रमा एक प्रसिद्ध तीर्थयात्रा है, जिसमें भक्त 3,300 किलोमीटर की पैदल परिक्रमा करते हैं. बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ओंकारेश्वर इस नदी के तट पर स्थित है. 

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