बिरजू महाराज का कायल था बॉलीवुड; रेखा, माधुरी से लेकर दीपिका पादुकोण तक को दी ट्रेनिंग, कई लेजेंड्री गानों के कोरियोग्राफ रहे बिरजू महाराज
पंडित बिरजू महाराज ने हिंदी सिनेमा को अपनी अमर कोरियोग्राफी से समृद्ध किया है. लखनऊ के कालका-बिंदादिन घराने में उनका जन्म 4 फरवरी 1938 को हुआ था. उन्होंने कई बॉलीवुड गानों को कोरियोग्राफ किया है. यहां बिरजू महाराज द्वारा कोरियोग्राफ किये गए कुछ आइकॉनिक डांस मूव्स के बारे में बताया गया है.
बिरजू महाराज
पंडित बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी 1938 को लखनऊ के कालका-बिंदादिन घराने में हुआ. उनके पिता अच्छन महाराज और चाचा शंभू नाथ, लच्छू महाराज कथक के दिग्गज थे. बचपन से ही उन्होंने कत्थक का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था. बिरजू महाराज को पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, फिल्मफेयर पुरस्कार जैसे कई सम्मानों से नवाजा गया है. उन्होंने कत्थक को फिल्मों में नई पहचान दी. माधुरी दीक्षित, दीपिका पादुकोण जैसी हीरोइनों को प्रशिक्षित किया.
काहे छेड़े मोहे (देवदास, 2002)
फिल्म 'देवदास' का यह गीत माधुरी दीक्षित पर फिल्माया गया है. माधुरी के डांस में बिरजू महाराज की कोरियोग्राफी की बारीकियां दिखती हैं. इसके लिए बिरजू महाराज ने फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता था.
मोहे रंग दे लाल (बाजीराव मस्तानी, 2015)
इस गाने में दीपिका पादुकोण ने मनमोहक प्रस्तुति दी है. इसकी कोरियोग्राफी भी बिरजू महाराज ने की थी.संजय लीला भांसाली की फिल्म में यह गीत बेहद हिट साबित हुआ.
उमराव जान
रेखा को मुजफ्फर अली की फिल्म में शास्त्रीय दरबारी महिला के किरदार के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था. बिरजू महाराज, गोपी कृष्ण फिल्म के गानों के मुख्य कोरियोग्राफरों में से एक थे.
जगावे सारी रैना (डेढ़ इश्किया)
महान कथक प्रतिपादक पंडित बिरजू महाराज ने इस गीत की कोरियोग्राफी की. इस गाने के लिए माधुरी दीक्षित को फिर से बिरजू महाराज के साथ काम करने का मौका मिला.
आन मिलो सजना (गदर)
पंडित बिरजू महाराज ने इस फिल्म के लिए ठुमरी गीत आन मिलो सजना की कोरियोग्राफी की थी. इस गाने में अमीषा पटेल और सनी देओल नजर आते हैं, इसे बेगम परवीन सुल्ताना और पंडित अजय चक्रवर्ती ने गाया है, और इसका नृत्य कथक शैली में दिग्गज पंडित बिरजू महाराज ने तैयार किया है.
निधन और विरासत
17 जनवरी 2022 की रात हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया. 83 वर्ष की आयु में दिल्ली में उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके शिष्य कत्थक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.