क्यों एक कंपनी में टिक नहीं पा रहे हैं Gen Z, पीछे की वजह जानकर हो जाएंगे हैरान!
Why Gen Z employees are hopping jobs faster: जेन Z तेजी से नौकरियां बदलने का काम कर रहे हैं. ऐसे में बार-बार नौकरी बदलने से उन्हें नई चुनौतियों को सामना करना पड़ता है और इसके साथ ही ऐसा करने से उनका आत्मविश्वास भी पहले से कई गुना ज्यादा बढ़ने भी लगता है. तो वहीं, दूसरी तरफ वह एक खराब मौहाल से बाहर निकलकर अच्छे माहौल में काम करने के लिए पूरी तरह से तैयार रहते हैं. लेकिन, लगातार नौकरी बदलने से ‘इंस्टेबिलिटी’ (अस्थिरता) का अहसास होता है. नए ऑफिस कल्चर में ढलना, नए लोगों से मिलना और परफॉरमेंस का दबाव एंग्जायटी (Anxiety) और बर्नआउट की वजह से उन्हें काम करने का मन नहीं करता है. इसके अलावा, नौकरी बदलने से भविष्य की वित्तीय सुरक्षा को लेकर भी मन में अनजाना डर बनने की संभावना सबसे ज्यादा बढ़ जाती है.
वर्क-लाइफ बैलेंस की प्राथमिकता
पिछली पीढ़ियों के विपरीत, जेन Z 'जीने के लिए काम' करने में पूरी तरह से विश्वास रखते हैं, न कि 'काम के लिए जीने' में. साथ ही अगर कोई नौकरी उनके निजी समय या मानसिक सुकून में बाधा डालती है, तो वे उसे तुरंत छोड़ने से डरते नहीं हैं.
सैलरी और आर्थिक सुरक्षा
तो वहीं, बढ़ती महंगाई और बेहतर अवसरों की उपलब्धता की वजह से यह पीढ़ी एक ही कंपनी में सालों तक 'लॉयल्टी' दिखाने के बजाय वहां जाना पसंद करती है जहां सबसे ज्यादा बेहतर पैकेज मिलता हो.
वैल्यू अलाइनमेंट
इसके अलावा जेन Z उन कंपनियों के साथ काम करना चाहते हैं जो सामाजिक मुद्दों, पर्यावरण और नैतिकता (Ethics) के प्रति गंभीर हों. साथ ही कंपनी की विचारधारा से मेल न खाने पर वे इस्तीफा देना ज्यादा बेहतर समझते हैं.
मेंटल हेल्थ का तनाव
बार-बार नौकरी बदलने से भले ही सैलरी बढ़ती हो, लेकिन हर बार नए माहौल, नए बॉस और नए काम के दबाव (Onboarding Stress) की वजह से मानसिक तनाव और एंग्जायटी (Anxiety) का खतरा तेजी से बढ़ने लगता है.
करियर में ठहराव का डर
इस पीढ़ी में 'FOMO' (छूट जाने का डर) बहुत ज्यादा देखने को मिल रहा है. हालाँकि, उन्हें यह लगता है कि एक ही जगह टिके रहने से वे नई तकनीक और स्किल्स नहीं सीख पाएंगे, जो भविष्य के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती है.
रिमोट वर्क और फ्लेक्सिबिलिटी
तो वहीं, भयंकर महामारी कोरोना के बाद, जेन Z के लिए 'वर्क फ्रॉम होम' या हाइब्रिड मॉडल एक तरह जरूरत बन चुका है. अगर कोई कंपनी ऑफिस आने के लिए बहुत ही ज्यादा दबाव डालती है, तो वे लचीले काम के घंटों वाली नौकरी की तलाश करना कुछ ही दिनों में शुरू कर देते हैं.
इम्पोस्टर सिंड्रोम और बर्नआउट
लगातार नई चुनौतियों और नई भूमिकाओं में ढलने की कोशिश में ये युवा ज्यादातर 'बर्नआउट' का शिकार हो जाते हैं. उन्हें अक्सर यह अहसास होने लगता है कि वे अपनी नई भूमिका के लायक नहीं हैं (Imposter Syndrome), जो उनके आत्मविश्वास को एक तरह से कम करने का काम करता है.