गोल्ड मेडलिस्ट लाइब्रेरियन ने मुफ्त खाने-रहने के लिए किया वेटर का काम, अनाथ बच्चों के नाम की कमाई, रजनीकांत ने भी माना ‘पिता’
Palam KalyanSundaram: आपने अक्सर सुना होगा कि किसी ने कुछ बड़ा दान कर दिया, तो किसी ने कुछ ऐसा दान किया, जिसके कारण वो सुर्खियों में रहा. आज हम एक ऐसे दानवीर की बात करने जा रहे हैं, जिसने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई दान कर दी. उन्होंने अपनी सैलेरी से खर्च के लिए पैसे भी नहीं निकाले. अपने रहने और खाने जैसी जरूरतों के लिए एक वेटर का काम किया. वहां की सैलेरी भी जमा की. उन्होंने वेटर की नौकरी इसलिए की क्योंकि वहां रहने और खाने की सुविधा मुफ्त में मिलती थी. हम बात कर रहे हैं तमिलनाडु के पद्म श्री अवॉर्डी और रिटायर्ड लाइब्रेरियन पालम कल्याणसुंदरम की, जिन्होंने अपनी पूरी सैलरी, पेंशन और अवॉर्ड की रकम गरीबों की भलाई के लिए दान कर दी.
पालम कल्याणसुंदरम एक ऐसे इंसान हैं, जिन्होंने समाज की भलाई के लिए बिना किसी स्वार्थ के काम किया है और उनकी असाधारण सेवा के लिए कई नेशनल और इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन ने उन्हें पहचान दी. उनका जन्म 1940 में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के मेलाकारिवेलमकुलम गांव में हुआ था. उन्होंने बहुत कम उम्र में अपने पिता को खो दिया था और उन्हें सिर्फ उनकी मां ने पाला-पोसा, जिन्होंने उनके मूल्यों को बनाने में अहम भूमिका निभाई.
क्या है कल्याणसुंदरम की जिंदगी का मकसद
कल्याणसुंदरम ने अपनी पढ़ाई डिस्टिंक्शन के साथ की. उन्होंने लिटरेचर और हिस्ट्री में डिग्री हासिल की और बाद में लाइब्रेरी साइंस में मास्टर डिग्री पूरी की. इसमें वे गोल्ड मेडलिस्ट के तौर पर ग्रेजुएट हुए. अपनी पढ़ाई में कामयाबियों के बावजूद, उनका पहला मकसद कभी भी अपनी कामयाबी या पैसा नहीं था बल्कि समाज की सेवा करना था.
गरीब-अनाथ बच्चों को दान की सैलेरी
उन्होंने अपने प्रोफेशनल करियर की शुरुआत थूथुकुडी जिले के श्रीवैकुंठम में कुमारकुरुपारा आर्ट्स कॉलेज में लाइब्रेरियन के तौर पर की थी. जब उन्हें अपनी पहली सैलरी मिली, तो कल्याणसुंदरम ने तय कर लिया कि यह पैसा उनके लिए नहीं है. अगले 35 साल की सर्विस में उन्होंने हर महीने अपनी पूरी सैलरी गरीब और अनाथ बच्चों की मदद के लिए दान कर दी. अपनी बेसिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने छोटे-मोटे काम किए.
देशहित में दान की सोने की चेन
1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लोगों से देश का साथ देने की अपील की, तो कल्याणसुंदरम बहुत भावुक हो गए. वह तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के. कामराज से मिले और उन्होंने जो सोने की चेन पहनी थी, उसे दान कर दिया. बाद में कामराज ने उन्हें सम्मानित किया. इस घटना ने लोगों की सेवा के लिए अपनी जिंदगी समर्पित करने के उनके इरादे को और मजबूत कर दिया.
पुश्तैनी प्रॉपर्टी भी की दान
1998 में रिटायर होने के बाद कल्याणसुंदरम ने अपनी पूरी पेंशन 10 लाख रुपए धर्मार्थ कामों के लिए दान कर दी. रिटायरमेंट के बाद भी, उन्होंने एक होटल में वेटर का काम जारी रखा ताकि वे अनाथालयों और एजुकेशनल फंड में दान जारी रखें. चार दशकों में उन्होंने न केवल अपनी सैलरी और पेंशन बल्कि अपनी पुश्तैनी प्रॉपर्टी भी समाज कल्याण के लिए दान कर दी.
पद्म श्री से किए गए सम्मानित
तमिलनाडु सरकार ने उन्हें बेस्ट सोशल वर्कर अवॉर्ड दिया. पंजाब सरकार ने उन्हें बेस्ट लाइब्रेरी स्कॉलर के तौर पर सम्मानित किया और उन्हें 2012 में बेस्ट लाइब्रेरियन के लिए बुकसेलर्स एंड पब्लिशर्स एसोसिएशन ऑफ साउथ इंडिया (BAPASI) अवॉर्ड मिला. समाज के लिए उनकी असाधारण सेवा के सम्मान में भारत सरकार ने 2023 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में दिया था.
काम को मिली इंटरनेशनल पहचान
बाद में उनके काम को इंटरनेशनल पहचान मिली. उन्हें कई इंटरनेशनल संस्थाओं ने सम्मानित किया. इंटरनेशनल लेवल पर उन्हें “मैन ऑफ़ द मिलेनियम” के नाम से भी जाना जाता है. यूनाइटेड स्टेट्स, कैम्ब्रिज में इंटरनेशनल बायोग्राफिकल सेंटर और यूनाइटेड नेशंस के ऑर्गनाइज़ेशन ने उन्हें 20वीं सदी के सबसे बेहतरीन और महान लोगों में से एक माना. एक अमेरिकन ऑर्गनाइज़ेशन ने उन्हें 30 करोड़ रुपए की प्राइज़ मनी दी. इसे भी उन्होंने पूरी तरह से चैरिटेबल कामों के लिए दान कर दिया.
रजनीकांत ने पिता के तौर पर लिया गोद
साउथ के सुपरस्टार रजनीकांत कल्याणसुंदरम के काम से खासा प्रभावित हुए. उन्होंने कल्याणसुंदरम के निस्वार्थ स्वभाव और लोगों की सेवा के लिए सार्वजनिक रूप से उनके प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया है. 2012 में उनकी नैतिक शक्ति और दया से प्रभावित होकर रजनीकांत ने उन्हें अपने पिता के रूप में गोद लेने का फैसला किया. एक्टर ने उन्हें बार बार अपने साथ रहने के लिए निमंत्रित किया लेकिन कल्याणसुंदरम ने मना कर दिया. उन्होंने अपनी सादी और स्वतंत्र जिंदगी जारी रखने का फैसला किया.