उत्तराखंड में है न्याय के देवता गोलू देव का मंदिर, घंटियां और चिट्ठी चढ़ाने से पूरी होती है मुराद?
Golu Devta Temple: उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है. यहां हर जगह पर अलग-अलग भगवान और उनकी अलग-अलग मान्यताएं हैं. यहां के ऐतिहासिक मंदिर अपनी मान्यताओं के लिए देश ही नहीं विदेशों तक काफी फेमस हैं. इसी तरह से पूरे कुमाऊं में गोलू देवता का मंदिर भी काफी फेमस है. ये न्याय के देवता और कुमाऊं के राजा कहे जाते हैं. मान्यता है कि चंद वंश के एक सेनापति ने 12वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण कराया था. इसकी मान्यता है कि अगर किसी का कोई काम नहीं बन रहा है, तो वे यहां आकर मन्नत मांगे, तो उनका काम पूरा हो जाता है.
कैसे दिखते हैं गोलू देवता
गोलू देवता को गोल्ज्यू और ग्वेल देवता भी कहा जाता है. इस मंदिर में मंदिर के अंदर सेफेद घोड़े पर बैठे हुए सिर पर सफेद पगड़ी बांधे गोलू देवता की प्रतिमा है. वे अपने हाथों में धनुष बाण लिए रहते हैं.
घंटी चढ़ाने से पूरी होती है मान्यता
गोलू देवता को स्थानीय संस्कृति में सबसे बड़े देवता माना जाता है. यहां देश-विदेश से लोग दर्शन करने और अपनी मन्नत मांगने के लिए आते हैं. इसको लेकर मान्यता है कि अगर आप गोलू देवता के मंदिर में किसी मन्नत के साथ घंटी चढ़ाते हो, तो आपकी मन्नत पूरी होती है.
चिट्ठी लिखकर करें अपील
इतना ही नहीं अगर किसी का कोई कोर्ट केस चल रहा है और उसकी सुनवाई नहीं हो पा रही है, तो चितई गोलू मंदिर में चिट्ठी लिखकर अपनी समस्या बताने से सारी समस्याओं का समाधान हो जाता है.
स्टांप पेपर पर लिखकर न्याय की गुहार
दरअसल भक्त स्टांप पेपर पर अपनी परेशानी और मनोकामनाएं लिखकर न्याय की गुहार लगाते हैं, तो मनौती पूरी होती है. इसके कारण मंदिर में हर तरफ घंटे-घंटियां और चिट्ठी स्टांप लगे हुए हैं.
बस से कैसे पहुंचें अल्मोड़ा
अगर आप इस मंदिर में जाना चाहते हैं, तो बता दें कि ये मंदिर चीड़ और मिमोसा के घने जंगलों से घिरा है. ये दिल्ली से लगभग 400 किलोमीटर दूर है. यहां पहुंचने के लिए आपको आनंद विहार से सीधे अल्मोड़ा की बस लेनी है.
ट्रेन से कैसे पहुंचें अल्मोड़ा
अगर आप ट्रेन से आ रहे हैं, तो काठगोदाम रेलवे स्टेशन पर उतरकर अल्मोड़ा के लिए बस या टैक्सी लेनी होगी. यहां जाकर आप भी मंदिर की परंपरा के हिसाब से अपनी मन्नत मांग सकते हैं.
डिस्क्लेमर
नोट: ये पूरी कहानी मान्यताओं के आधार पर बनाई गई है. इंडिया न्यूज इसकी पुष्टि नहीं करता है. न ही इस तरह की मान्यताओं को बढ़ावा देता है.