पानी की कमी से गांव छोड़ रहे थे लोग, फिर इस डॉक्टर ने उठाया फावड़ा, सूखी धरती पर पहुंचाया पानी, 7 नदियों को किया जिंदा
Water Man of India: बात है साल 1985 की, जब एक आयुर्वेदिक डॉक्टर राजस्थान के अलवर जिले के भीकमपुरा गांव पहुंचे. वहां एक स्कूल और एक अपना दवाखाना खोला. इसी दौरान वहां पर एक बुजुर्ग ग्रामीण आया, जिन्होंने उनसे कहा कि उन्हें शिक्षा और दवा की नहीं बल्कि सबसे पहले पानी की जरूरत है. उनकी इस बात ने डॉक्टर को भावुक कर दिया और उनकी आंखें खोल दिया. इसके बाद उन्होंने अपनी डॉक्टरी छोड़कर फावड़ा उठा लिया. हम बात कर रहे हैं आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉक्टर राजेंद्र सिंह की. उन्हें अब भारत के जल पुरुष के नाम से जाना जाता है.
ग्रामीणों की बदहाली देख हुए विचलित
डॉक्टर राजेंद्र सिंह ने आयुर्वेदिक चिकित्सा में स्नातक किया. उन्होंने जयपुर में अपनी प्रैक्टिस शुरू की. हालांकि वे ग्रामीणों की बदहाली और उनको शहरों की तरफ पलायन करते देख वे विचलित हो गए.
'बुजुर्ग ग्रामीण ने खोली आंखें'
साल 1985 में वे राजस्थान के अलवर जिले के भीकमपुरा गांव पहुंचे. यहां पर उन्होंने एक स्कूल और एक दवाखाना शुरू कर दिया. वहां पर एक बुजुर्ग ग्रामीण ने उनसे कहा कि उन्हें शिक्षा और दवा की नहीं बल्कि पानी की जरूरत है.
सीखी जल संचयन की तकनीक
इस बात से वे बहुत भावुक हो गए और उन्होंने बड़े बुजुर्गों से पारंपरिक जल संचयन की तकनीक सीखी. इसके बाद फावड़ा उठाकर जोहड़ यानी मिट्टी की बांध बनानी शुरू की.
15000 से ज्यादा जल संरचनाएं
शुरुआत में ग्रामीणों ने उनका विरोध किया लेकिन उनकी लगन देखकर वे सब भी उनके साथ जुड़ गए. उन्होंने एनजीओ भारत तरुण संघ बनाया. इसके माध्यम से उन्होंने लगभग 15000 से ज्यादा जल संरचनाएं बनाईं.
सूख चुकी नदियों में आया पानी
इससे अलवर की अरवरी, रूपारेल, सरसा, भगानी और जहाजवाली जैसी कई सूख चुकी नदियों में दोबारा पानी बहने लगा. इससे आसपास के तमाम जिलों में पानी की किल्लत से छुटकारा मिला.
मिले कई अवॉर्ड्स
इसके बाद से उन्हें भारत के जल पुरुष के नाम से जाना जाने लगा. उन्हें देश में कई अवॉर्ड्स से सम्मानित किया गया. साथ ही कई इंटरनेशनल अवॉर्ड्स भी मिले.
इंटरनेशनल लेवल पर मिले ये प्राइज
उनके इस असाधारण योगदान के लिए उन्हें 2001 में रमन मैग्सेसे पुरस्कार और स्टॉकहोम वाटर प्राइज से नवाजा गया. इससे प्राइज को जल का नोबेल कहा जाता है.