2BHK में रहने वाला CM! बंगाल में किया सुधार फिर गुजारी सादी जिंदगी, ममता के आते ही खेल खराब
Buddhadeb Bhattacharjee: आज हम आपको एक ऐसे महान नेता के बारे में बताने वाले हैं जिनसे आप शायद ही वाकिफ हों. दरअसल, बुद्धदेव भट्टाचार्य पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और एक प्रमुख कम्युनिस्ट राजनेता थे. इनका 8 अगस्त, 2024 को 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया था. बता दें कि उन्होंने 2000 से 2011 तक पश्चिम बंगाल के 7वें मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया और वो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के एक वरिष्ठ नेता थे. बता दें कि 1 मार्च, 1944 को जन्मे भट्टाचार्य का राजनीतिक करियर 5 दशकों से भी अधिक समय तक चला.
ऐसे मिली हार
बता दें कि वो व्यापार के प्रति अपनी अपेक्षाकृत खुली नीतियों के लिए जाने जाते थे, जो उनकी पार्टी के पारंपरिक रूप से पूंजीवाद-विरोधी रुख के विपरीत थीं. लेकिन, मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान भूमि अधिग्रहण को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा के आरोप लगे, जिसके कारण 2011 के चुनाव में उनकी हार हुई.
सबसे लंबी चली कम्युनिस्ट सरकार
इस हार के साथ ही पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा का 34 वर्षों का शासन समाप्त हो गया; यह दुनिया की सबसे लंबे समय तक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार थी.
ऐसे शुरू किया राजनीतिक करियर
भट्टाचार्य 1966 में एक प्राथमिक सदस्य के रूप में CPI(M) में शामिल हुए. उन्होंने खाद्य आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और 1968 में वियतनाम के पक्ष का समर्थन किया. उसी वर्ष, वो डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन के राज्य सचिव चुने गए, जिसका बाद में डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया में विलय हो गया. भट्टाचार्य 1981 तक इस पद पर रहे, जिसके बाद बोरन बसु ने उनका स्थान लिया. अपने शुरुआती राजनीतिक करियर के दौरान, उन्हें प्रमोद दासगुप्ता का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ.
2BHK फ़्लैट में काटी जिंदगी
हैरान कर देने वाली बात ये है कि भट्टाचार्य जी ने अपनी बची-कुची जिंदगी एक 2BHK फ्लेट में काटी. फिर एक सुबह ऐसी आई जब उन्होंने उसी फ्लैट में अंतिम सांस ली. यह एक 2BHK अपार्टमेंट है. वो लंबे समय से बीमार चल रहे थे; उन्हें फेफड़ों की बीमारी थी और साँस लेने में तकलीफ़ हो रही थी.
ममता के आते ही पलटा पासा
भट्टाचार्जी के नेतृत्व में, वामपंथी दलों ने 2001 और 2006 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव लड़े. 2006 में अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने वामपंथी सरकार की आर्थिक नीतियों में आमूल-चूल बदलाव किए, जिससे वे उद्योग और व्यापार के लिए कहीं अधिक अनुकूल बन गईं. हालाँकि, ठीक इसी दौर में, ममता बनर्जी के नेतृत्व में उनके औद्योगीकरण के प्रयासों के खिलाफ एक विशाल आंदोलन खड़ा हो गया. परिणामस्वरूप, 2011 के विधानसभा चुनावों में वामपंथी दलों को हार का सामना करना पड़ा.
वामदलों की राजनीति को बड़ा झटका
2011 में मिली हार के बाद, भट्टाचार्जी और वामपंथी दलों की राजनीति को एक बड़ा झटका लगा. भट्टाचार्जी हाशिए पर चले गए. भट्टाचार्जी का सफ़र एक 'कॉमरेड' से मुख्यमंत्री बनने तक का बेहद शानदार रहा. वे 1966 में CPI(M) में शामिल हुए. उन्होंने 1987 में ज्योति बसु की सरकार में मंत्री के तौर पर काम किया; हालाँकि, इस बीच कुछ मतभेद उभरने के कारण, वे कुछ समय के लिए सरकार से बाहर रहे.