Shocking Truth Of Cricket: 0 पर आउट होने पर खुद को शारीरिक सजा देता था युवा खिलाड़ी! जानिए क्रिकेट ड्रेसिंग रूम का वो खौफनाक सच और मेंटल प्रेशर की कड़वी हकीकत जो रोंगटे खड़े कर देगी.
0 पर आउट होने पर खुद को शारीरिक सजा देता था युवा खिलाड़ी!
स्टेडियम में गूंजती दर्शकों की तालियां, खिलाड़ियों की चकाचौंध भरी जिंदगी और टीवी स्क्रीन पर मुस्कुराते चेहरे, क्रिकेट की दुनिया बाहर से जितनी रंगीन और ग्लैमरस दिखती है, इसके भीतर का अंधेरा उतना ही भयानक है. हम अक्सर किसी खिलाड़ी को 0 पर आउट होते देखते हैं, उसकी फॉर्म पर सवाल उठाते हैं और टीवी बंद करके आगे बढ़ जाते हैं या चैनल बदल देते हैं. लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि उस 0 के बाद, ड्रेसिंग रूम के बंद दरवाजों के पीछे वह खिलाड़ी किस मानसिक दौर से गुजरता है? शायद ही आपको पता होगा। इसका खुलासा किया है इंग्लैंड के तेज़ गेंदबाज़ ब्रायडन कार्स ने. उन्होंने खिलाड़ियों के जीवन के बारे में क्या कुछ कहा है, आइए जानते हैं.
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संस्थान ‘The Guardian’ में हाल ही में छपे एक लेख ने खिलाड़ियों के जीवन के अनसुने सच को बेनकाब किया है. इस लेख में उस खिलाड़ी(पूर्व क्रिकेटर) का नाम तो नहीं लिया गया है लेकिन उन्होंने क्रिकेट जगत की इस काली सच्चाई से पर्दा उठाया है.
यह लेख इंग्लैंड के तेज़ गेंदबाज़ ब्रायडन कार्स (Brydon Carse) से जुड़े हालिया लेट-नाइट पार्टी विवाद के बाद सामने आया. लोग पूछ रहे थे कि पेशेवर खिलाड़ी आखिर रात को ऐसी लापरवाही क्यों करते हैं? लेकिन इसके पीछे की जो कहानी बताई गई है वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है.
पूर्व क्रिकेटर ने अपने साथ खेले एक बेहद युवा क्रिकेटर का ज़िक्र करते हुए लिखा, ‘मैं एक ऐसे युवा खिलाड़ी को जानता था, जो मैच में कम रन बनने पर खुद को शारीरिक रूप से चोट पहुंचाता था. उसे किसी ने नहीं कहा था कि उसकी कीमत सिर्फ उसके स्कोर से तय होती है, लेकिन क्रिकेट का माहौल सालों से उसे यही सिखा रहा था. ब्रायडन कार्स की खबर पढ़कर मुझे फिर वही साथी याद आ गया.’
पूर्व क्रिकेटर के मुताबिक, खिलाड़ियों का शराब की लत में डूबना, लेट-नाइट पार्टियां करना या खुद को नुकसान पहुंचाना सिर्फ ‘लापरवाही’ नहीं है. यह उस डर और असुरक्षा से भागने का रास्ता है, जो यह खेल उन्हें हर पल देता है.
वो कहते हैं, तेज़ गेंदबाजों की आधी जिंदगी चोटों में बीतती है और बल्लेबाजों की उंगलियां टूटती हैं. लेकिन क्रिकेट में दर्द का मतलब रुकना नहीं होता, बल्कि दर्द छुपाकर खेलते रहना ही ‘प्रोफेशनल एटीट्यूड’ मान लिया जाता है.
आप पूरे हफ्ते नेट्स में पसीना बहाएं, लेकिन मैच की पहली गेंद पर 0 पर आउट हो सकते हैं. हर मैच के साथ खिलाड़ी के सिर पर तलवार लटकी होती है- ‘क्या तुम टीम में रहने के लायक हो?’
एकेडमी स्तर से ही बच्चों को सिर्फ बैटिंग-बॉलिंग सिखाई जाती है. जब 10-15 साल तक किसी बच्चे की इंसान के रूप में पूरी वैल्यू सिर्फ उसके ‘स्कोरकार्ड’ से तय होती है, तो पहली असफलता मिलते ही उसका मानसिक संतुलन बिखर जाता है.
ड्रेसिंग रूम में होने वाला भारी हंसी-मजाक अक्सर एक ढाल की तरह इस्तेमाल होता है, ताकि कोई खिलाड़ी दूसरे के असली दर्द और डिप्रेशन को न देख सके.
यह खेल अब सिर्फ रन और विकेट का हिसाब रखने तक सीमित नहीं रह गया है; यह सीधे तौर पर इंसान की दिमागी सेहत से जुड़ा मुद्दा बन चुका है. जब तक खेल का पूरा इकोसिस्टम खिलाड़ियों को सिर्फ ‘रन बनाने की मशीन’ की तरह देखता रहेगा, तब तक मैदान के पीछे की यह घुटन और असफलता का खौफ खिलाड़ियों को ऐसे ही अंदर से तोड़ता रहेगा.
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