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कौन थें ज्योति बसु? जो लंबे समय तक रहे पश्चिम बंगाल के सीएम, कितने साल तक संभला पद और विरोधी भी उनके राजनीतिक कद को क्यों मानते थे? जानें पांच दिलस्तप बातें

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026: पश्चिम बंगाल के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले ज्योति बसु कौन थे? वे कितने साल तक इस पद पर रहे, ज्योति बसु  वे किस पार्टी से थे और उनके विरोधी भी उनके राजनीतिक कद को क्यों मानते थे? जानें उनके बारे में पांच दिलचस्प बातें.

Written By: Shristi S
Last Updated: 2026-03-12 18:18:46

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West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 जल्द ही होने वाले हैं. वर्तमान ममता सरकार और बीजेपी आर-पार की लड़ाई में जुटी हैं. सीएम ममता बनर्जी लगातार 3 बार बंगाल की सत्ता पर काबिज है, लेकिन क्या आप जानते है कि पश्चिम बंगला के वो कौन से सीएम है, जिन्होंने सबसे लंबे समय तक बंगाल की सत्ता संभाली थीं. बंगाल के पूर्व सीएम ज्योति बसु ने बंगाल की सत्ता को काफी लंबे समय तक काबिज रहे थें. उनके काम के मुरिद बसु के विरोधी भी रहे हैं. 
 
ऐसे चलिए विस्तार से जानें कि ज्योति बसु कौन थें, वे कितने साल तक बंगाल के सीएम के तौर पर बंगाल में काबिज रहे. बसु किस पार्टी से थे और उनके विरोधी भी उनके राजनीतिक कद को क्यों मानते थे. आज हम जानेंगे उनके बारे में पांच दिलचस्प बातें.
 

कौन थें बंगाल के सीएम ज्योति बसु?

ज्योतिरिंद्र बसु का जन्म सेंट्रल कोलकाता के अमीर बसु परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई धर्मतला के लोरेटो स्कूल में की. बाद में, 1925 में, उन्होंने सेंट ज़ेवियर्स स्कूल में ट्रांसफर ले लिया. बसु ने प्रेसीडेंसी कॉलेज में इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई की और 1935 में लॉ की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए. लंदन में ही ज्योति को पॉलिटिक्स के लिए अपना असली पैशन पता चला. वह ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की आइडियोलॉजी से बहुत प्रभावित थे, जिससे उन्हें उनके दोस्त भूपेश गुप्ता ने मिलवाया था.रजनी पाम दत्त जैसे कम्युनिस्ट नेताओं के साथ उनके जुड़ाव के कारण, वे 1930 में ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए.
 

कब बने थें बंगाल के सीएम?

ज्योति बसु का पॉलिटिकल करियर आगे बढ़ा और CPI(M) लीडर ने कई सफलताएं हासिल कीं. इस दौरान, उन्होंने राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट) और लेफ्ट फ्रंट दोनों को लगातार मज़बूत किया. जब 1977 के असेंबली इलेक्शन में लेफ्ट फ्रंट को पूरी बहुमत मिली, तो ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री के लिए बिना किसी विरोध के उम्मीदवार बने और चुने गए. उन्होंने 21 जून 1977 से 6 नवंबर 2000 तक 23 साल तक इस पद पर काम किया. 
 

ज्योति बसु के विरोधी भी उनके राजनीतिक कद को क्यों मानते थे? 5 बड़ी बातें 

1. ज्योति बसु और उनसे पहले के कांग्रेस नेता सिद्धार्थ शंकर रे के बीच राजनीतिक दुश्मनी थी, लेकिन उनके निजी रिश्ते अच्छे थे. बांग्लादेश बनने से कुछ समय पहले, सिद्धार्थ ने उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर पर ज्योति बसु के लिए एक सीक्रेट मीटिंग रखी थी.
 2. इसके अलावा, बसु और बंगाल कांग्रेस नेता गनी खान चौधरी के बीच बहुत अच्छे रिश्ते थे.
 3. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी बसु के काम की तारीफ़ की और 1989 में पंचायती राज पर एक नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑर्गनाइज़ की. इस इवेंट में, राजीव गांधी ने ज्योति बसु के काम की बहुत तारीफ़ की.
 4. इसके अलावा, सोशलिस्ट नेताओं और अटल बिहारी वाजपेयी और एल.के. जैसे राइट-विंग नेताओं के बीच सोच में मतभेद होने के बावजूद, बसु ने अपनी पार्टी के लिए एक बड़ा काम किया.
 5. आडवाणी के साथ उन्होंने ज्योति बसु के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे. बिधान चंद्र रॉय ने भी बसु की भूमिका की प्रशंसा की.
 बसु सरकार के दौरान, कई बड़े काम किए गए. ज़मीन सुधार खास थे, जिनमें ज़मीन मालिकों और ज़मीनहीन किसानों को सरकारी कब्ज़े वाली ज़मीन पर मालिकाना हक देना शामिल था. पंचायती राज और ज़मीन सुधारों को असरदार तरीके से लागू करने से ज़मीनी स्तर पर सत्ता का डीसेंट्रलाइज़ेशन हुआ.

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Written By: Shristi S
Last Updated: 2026-03-12 18:18:46

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West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 जल्द ही होने वाले हैं. वर्तमान ममता सरकार और बीजेपी आर-पार की लड़ाई में जुटी हैं. सीएम ममता बनर्जी लगातार 3 बार बंगाल की सत्ता पर काबिज है, लेकिन क्या आप जानते है कि पश्चिम बंगला के वो कौन से सीएम है, जिन्होंने सबसे लंबे समय तक बंगाल की सत्ता संभाली थीं. बंगाल के पूर्व सीएम ज्योति बसु ने बंगाल की सत्ता को काफी लंबे समय तक काबिज रहे थें. उनके काम के मुरिद बसु के विरोधी भी रहे हैं. 
 
ऐसे चलिए विस्तार से जानें कि ज्योति बसु कौन थें, वे कितने साल तक बंगाल के सीएम के तौर पर बंगाल में काबिज रहे. बसु किस पार्टी से थे और उनके विरोधी भी उनके राजनीतिक कद को क्यों मानते थे. आज हम जानेंगे उनके बारे में पांच दिलचस्प बातें.
 

कौन थें बंगाल के सीएम ज्योति बसु?

ज्योतिरिंद्र बसु का जन्म सेंट्रल कोलकाता के अमीर बसु परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई धर्मतला के लोरेटो स्कूल में की. बाद में, 1925 में, उन्होंने सेंट ज़ेवियर्स स्कूल में ट्रांसफर ले लिया. बसु ने प्रेसीडेंसी कॉलेज में इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई की और 1935 में लॉ की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए. लंदन में ही ज्योति को पॉलिटिक्स के लिए अपना असली पैशन पता चला. वह ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की आइडियोलॉजी से बहुत प्रभावित थे, जिससे उन्हें उनके दोस्त भूपेश गुप्ता ने मिलवाया था.रजनी पाम दत्त जैसे कम्युनिस्ट नेताओं के साथ उनके जुड़ाव के कारण, वे 1930 में ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए.
 

कब बने थें बंगाल के सीएम?

ज्योति बसु का पॉलिटिकल करियर आगे बढ़ा और CPI(M) लीडर ने कई सफलताएं हासिल कीं. इस दौरान, उन्होंने राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट) और लेफ्ट फ्रंट दोनों को लगातार मज़बूत किया. जब 1977 के असेंबली इलेक्शन में लेफ्ट फ्रंट को पूरी बहुमत मिली, तो ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री के लिए बिना किसी विरोध के उम्मीदवार बने और चुने गए. उन्होंने 21 जून 1977 से 6 नवंबर 2000 तक 23 साल तक इस पद पर काम किया. 
 

ज्योति बसु के विरोधी भी उनके राजनीतिक कद को क्यों मानते थे? 5 बड़ी बातें 

1. ज्योति बसु और उनसे पहले के कांग्रेस नेता सिद्धार्थ शंकर रे के बीच राजनीतिक दुश्मनी थी, लेकिन उनके निजी रिश्ते अच्छे थे. बांग्लादेश बनने से कुछ समय पहले, सिद्धार्थ ने उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर पर ज्योति बसु के लिए एक सीक्रेट मीटिंग रखी थी.
 2. इसके अलावा, बसु और बंगाल कांग्रेस नेता गनी खान चौधरी के बीच बहुत अच्छे रिश्ते थे.
 3. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी बसु के काम की तारीफ़ की और 1989 में पंचायती राज पर एक नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑर्गनाइज़ की. इस इवेंट में, राजीव गांधी ने ज्योति बसु के काम की बहुत तारीफ़ की.
 4. इसके अलावा, सोशलिस्ट नेताओं और अटल बिहारी वाजपेयी और एल.के. जैसे राइट-विंग नेताओं के बीच सोच में मतभेद होने के बावजूद, बसु ने अपनी पार्टी के लिए एक बड़ा काम किया.
 5. आडवाणी के साथ उन्होंने ज्योति बसु के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे. बिधान चंद्र रॉय ने भी बसु की भूमिका की प्रशंसा की.
 बसु सरकार के दौरान, कई बड़े काम किए गए. ज़मीन सुधार खास थे, जिनमें ज़मीन मालिकों और ज़मीनहीन किसानों को सरकारी कब्ज़े वाली ज़मीन पर मालिकाना हक देना शामिल था. पंचायती राज और ज़मीन सुधारों को असरदार तरीके से लागू करने से ज़मीनी स्तर पर सत्ता का डीसेंट्रलाइज़ेशन हुआ.

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