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सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति से जुड़े, कैसे प्रफुल्ल चंद्र घोष बन गए बंगाल के पहले मुख्यमंत्री?

West Bengal Assembly Elections 2026: प्रफुल्ल चंद्र घोष एक प्रमुख राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी थे. उनका जन्म 24 दिसंबर, 1891 को अविभाजित बंगाल के ढाका ज़िले के मालकांडा में हुआ था. अपने विद्यार्थी जीवन में वे अत्यंत प्रतिभाशाली थे. रसायन शास्त्र में अपनी स्नातक और स्नातकोत्तर, दोनों ही डिग्रियों में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया था. उन्होंने कुछ समय तक प्रेसिडेंसी कॉलेज में अध्यापन कार्य किया. बाद में, उन्होंने कोलकाता स्थित टकसाल में उप-सहायक मास्टर के रूप में सेवाएं दीं.

Written By: Shristi S
Last Updated: 2026-04-06 15:58:08

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Prafulla Chandra Ghosh Biography: पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव इसी महीने अप्रैल में 2 चरणों में होने वाले हैं. इस वक्त बंगाल की सत्ता पर सीएम ममता बनर्जी काबिज है. लेकिन क्या आपके मन में कभी यह सवाल उठा कि आजादी के बाद बंगाल के पहले सीएम कौन थे. अगर हां, तो यह खबर आपके लिए ही है.  इतिहास के कुछ ऐसे नाम होते हैं, जो केवल अपने पद के कारण नहीं, बल्कि अपने फैसलों की वजह सेअमर हो जाते हैं. प्रफुल्ल चंद्र घोष का जीवन इसी का उदाहरण है.
 
सरकारी नौकरी हर दौर में सबसे सुरक्षित और सम्मानजनक मानी जाती है, घोष ने उसे छोड़कर देश सेवा का रास्ता चुना. उनकी इसी साहस और देश के प्रति समर्पण ने उन्हें पश्चिम बंगाल का पहला सीएम बने. वह बंगाल के प्रधानमंत्री के तौर पर भी जानें जाते थे. ऐसे में यह जानना काफी दिलचस्प हो जाता है कि उन्होंने नौकरी छोड़ बंगाल के पहले सीएम तक का सफर कैसे तय किया.
 

प्रारंभिक जीवन

प्रफुल्ल चंद्र घोष एक प्रमुख राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी थे. उनका जन्म 24 दिसंबर, 1891 को अविभाजित बंगाल के ढाका ज़िले के मालकांडा में हुआ था. अपने विद्यार्थी जीवन में वे अत्यंत प्रतिभाशाली थे. रसायन शास्त्र में अपनी स्नातक और स्नातकोत्तर, दोनों ही डिग्रियों में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया था. उन्होंने कुछ समय तक प्रेसिडेंसी कॉलेज में अध्यापन कार्य किया. बाद में, उन्होंने कोलकाता स्थित टकसाल में उप-सहायक मास्टर के रूप में सेवाएं दीं.
 

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका

घोष की स्वदेशी आंदोलन में गहरी रुचि थी, लेकिन उन्होंने अपनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चुना. लगभग 1913 में, जब वे दामोदर बाढ़ राहत कार्य में लगे हुए थे, तब घोष की मुलाकात सुरेंद्रनाथ बनर्जी से हुई, जिससे राष्ट्रवादी आंदोलन में उनकी रुचि फिर से जाग उठी. इस मुलाकात के बाद, दिसंबर 1920 में ढाका में गांधी के भाषण से प्रेरित होकर, वे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए.
 

नौकरी से इस्तीफा दें महात्मा गांधी के आदर्शों पर चले घोष

प्रफुल्ल चंद्र घोष ने टकसाल कर्मचारी के तौर पर अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए. इस दौरान उन्हें आठ साल की जेल की सज़ा सुनाई गई. प्रफुल्ल चंद्र घोष ने महात्मा गांधी के आदर्शों पर आधारित ‘अभय आश्रम’ की स्थापना की. 1924 में, वे ‘बेंगिया प्रादेशिक राष्ट्रीय समिति’ के सचिव बने. 1930 में वे नमक सत्याग्रह में शामिल हुए. 1939 में, वे फिर से कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य बने.
 

संविधान निर्माण में योगदान

घोष को कांग्रेस पार्टी के टिकट पर बंगाल प्रेसीडेंसी से संविधान सभा के लिए चुना गया था। उन्होंने संविधान सभा की बहसों में सक्रिय रूप से भाग नहीं लिया.
 

जब घोष बने पश्चिम बंगाल के पहले सीएम

घोष 1947 में पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए और उन्हें पश्चिम बंगाल का पहला मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया. हालांकि, कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रहे आपसी झगड़ों के कारण, उन्हें 1948 में मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा. घोष 1967 में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर फिर से पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए और उन्हें खाद्य विभाग सौंपा गया.
 
1967 के सूखे के दौरान भोजन की कमी के संकट को ठीक से न संभाल पाने के कारण यूनाइटेड फ्रंट कमेटी ने घोष की कड़ी आलोचना की. उसी साल बाद में, उन्होंने सरकार से इस्तीफ़ा दे दिया और एक नई पार्टी बनाई प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (PDF). PDF को विधानसभा के दूसरे सदस्यों से समर्थन मिलने लगा और नवंबर 1967 के आखिर तक, घोष के पास सरकार बनाने के लिए काफ़ी समर्थक हो गए थे. हालांकि, यह ज़्यादा समय तक नहीं चला और 1968 में विधानसभा भंग कर दी गई. 

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Prafulla Chandra Ghosh Biography: पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव इसी महीने अप्रैल में 2 चरणों में होने वाले हैं. इस वक्त बंगाल की सत्ता पर सीएम ममता बनर्जी काबिज है. लेकिन क्या आपके मन में कभी यह सवाल उठा कि आजादी के बाद बंगाल के पहले सीएम कौन थे. अगर हां, तो यह खबर आपके लिए ही है.  इतिहास के कुछ ऐसे नाम होते हैं, जो केवल अपने पद के कारण नहीं, बल्कि अपने फैसलों की वजह सेअमर हो जाते हैं. प्रफुल्ल चंद्र घोष का जीवन इसी का उदाहरण है.
 
सरकारी नौकरी हर दौर में सबसे सुरक्षित और सम्मानजनक मानी जाती है, घोष ने उसे छोड़कर देश सेवा का रास्ता चुना. उनकी इसी साहस और देश के प्रति समर्पण ने उन्हें पश्चिम बंगाल का पहला सीएम बने. वह बंगाल के प्रधानमंत्री के तौर पर भी जानें जाते थे. ऐसे में यह जानना काफी दिलचस्प हो जाता है कि उन्होंने नौकरी छोड़ बंगाल के पहले सीएम तक का सफर कैसे तय किया.
 

प्रारंभिक जीवन

प्रफुल्ल चंद्र घोष एक प्रमुख राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी थे. उनका जन्म 24 दिसंबर, 1891 को अविभाजित बंगाल के ढाका ज़िले के मालकांडा में हुआ था. अपने विद्यार्थी जीवन में वे अत्यंत प्रतिभाशाली थे. रसायन शास्त्र में अपनी स्नातक और स्नातकोत्तर, दोनों ही डिग्रियों में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया था. उन्होंने कुछ समय तक प्रेसिडेंसी कॉलेज में अध्यापन कार्य किया. बाद में, उन्होंने कोलकाता स्थित टकसाल में उप-सहायक मास्टर के रूप में सेवाएं दीं.
 

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका

घोष की स्वदेशी आंदोलन में गहरी रुचि थी, लेकिन उन्होंने अपनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चुना. लगभग 1913 में, जब वे दामोदर बाढ़ राहत कार्य में लगे हुए थे, तब घोष की मुलाकात सुरेंद्रनाथ बनर्जी से हुई, जिससे राष्ट्रवादी आंदोलन में उनकी रुचि फिर से जाग उठी. इस मुलाकात के बाद, दिसंबर 1920 में ढाका में गांधी के भाषण से प्रेरित होकर, वे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए.
 

नौकरी से इस्तीफा दें महात्मा गांधी के आदर्शों पर चले घोष

प्रफुल्ल चंद्र घोष ने टकसाल कर्मचारी के तौर पर अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए. इस दौरान उन्हें आठ साल की जेल की सज़ा सुनाई गई. प्रफुल्ल चंद्र घोष ने महात्मा गांधी के आदर्शों पर आधारित ‘अभय आश्रम’ की स्थापना की. 1924 में, वे ‘बेंगिया प्रादेशिक राष्ट्रीय समिति’ के सचिव बने. 1930 में वे नमक सत्याग्रह में शामिल हुए. 1939 में, वे फिर से कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य बने.
 

संविधान निर्माण में योगदान

घोष को कांग्रेस पार्टी के टिकट पर बंगाल प्रेसीडेंसी से संविधान सभा के लिए चुना गया था। उन्होंने संविधान सभा की बहसों में सक्रिय रूप से भाग नहीं लिया.
 

जब घोष बने पश्चिम बंगाल के पहले सीएम

घोष 1947 में पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए और उन्हें पश्चिम बंगाल का पहला मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया. हालांकि, कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रहे आपसी झगड़ों के कारण, उन्हें 1948 में मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा. घोष 1967 में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर फिर से पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए और उन्हें खाद्य विभाग सौंपा गया.
 
1967 के सूखे के दौरान भोजन की कमी के संकट को ठीक से न संभाल पाने के कारण यूनाइटेड फ्रंट कमेटी ने घोष की कड़ी आलोचना की. उसी साल बाद में, उन्होंने सरकार से इस्तीफ़ा दे दिया और एक नई पार्टी बनाई प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (PDF). PDF को विधानसभा के दूसरे सदस्यों से समर्थन मिलने लगा और नवंबर 1967 के आखिर तक, घोष के पास सरकार बनाने के लिए काफ़ी समर्थक हो गए थे. हालांकि, यह ज़्यादा समय तक नहीं चला और 1968 में विधानसभा भंग कर दी गई. 

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