कागजों पर पूर्ण शराबबंदी और जमीन पर बोतलों का अंबार, बिहार में शराबबंदी के बीते आठ साल इसी विरोधाभास की कहानी कह रहे हैं. साल 2016 में जिस मंशा के साथ सूबे को ‘ड्राय स्टेट’ घोषित किया गया था, वह मंशा आज पुलिस की छापेमारी और आए दिन बरामद होती शराब की खेप के बीच कहीं धुंधली पड़ती दिख रही है. पाबंदी के बावजूद शराब का यह ‘समांतर बाजार’ प्रशासन की सख्ती और तस्करों की चालाकी के बीच एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है. इन सब के बीच बिहार से एक और मामला सामने आया है जिसमें देखा जा सकता है कि कैसे प्रशासन को हर रोज ऐसे ही चख्मा दिया जाता है और ठिकाने पर शराब की खेप पहुंचाई जाती है.
कुर्सी को काटकर उसमें भर रखी थी शराब
दरअसल सोशल मीडिया एक्स पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें देखा सकता है कि कैसे पुलिस के नाम के नीचे एक युवक शराब की खेप को सही ठिकाने पर पहुंचाने की कोशिश में था हालांकि वह कामयाब नहीं हो सका. पुलिस ने उसे मौके पर ही पकड़ लिया। वीडियो में देखा जा सकता है कि प्रिया सिंह नाम की एक यूजर ने अपने एक्स अकाउंट पर यह वीडियो साझा करते हुए लिखा ‘बिहार में शराब बैन है, लेकिन यहां हर पियक्क्ड़ को शराब आसानी से मिल रही है. यहां लोगों ने शराब छिपाकर ले जाने की, ऐसी ऐसी निंजा टेक्निक इजात कर ली है, जिसे देख किसी का भी दिमाग चकरा सकता है. अब इस महाशय को देखिये, कुर्सियों के बीच शराब की पैकिंग हुई थी.
बिहार में शराब बैन है, लेकिन यहां हर पियक्क्ड़ को शराब आसानी से मिल रही है.
यहां लोगों ने शराब छिपाकर ले जाने की, ऐसी ऐसी निंजा टेक्निक इजात कर ली है, जिसे देख किसी का भी दिमाग चकरा सकता है.
अब इस महाशय को देखिये, कुर्सियों के बीच शराब की पैकिंग हुई थी. pic.twitter.com/HoZ4oALeZg
— Priya singh (@priyarajputlive) February 21, 2026
कुल मिलाकर, बिहार में साल 2016 से कागजों पर शराबबंदी का सख्त कानून लागू तो है, लेकिन धरातल पर इसकी तस्वीर उम्मीदों से कोसों दूर है. सच तो यह है कि न तो शराब की अवैध बिक्री पर पूरी तरह लगाम लग सकी है और न ही शौकीनों ने जाम से तौबा की है. फर्क बस इतना आया है कि जो बोतलें कभी दुकानों के काउंटर पर सजा करती थीं, वे अब ‘होम डिलीवरी’ और ‘निंजा तकनीक’ के जरिए चोरी-छिपे ठिकाने तक पहुँच रही हैं. भले ही अब सड़कों पर पहले जैसा खुला तमाशा नहीं दिखता है और न ही दुकानों के बाहर कतारें, लेकिन इस ‘पर्दे के पीछे’ के खेल ने एक नई और जानलेवा मुसीबत को जन्म दे दिया है। आज भी जहरीली शराब का कहर रह-रहकर मासूम जिंदगियों को निगल रहा है, जो यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह पाबंदी वाकई अपने उद्देश्यों में सफल रही है या इसने केवल अपराध के नए और खतरनाक रास्तों को जन्म दिया है.