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Makhana Price Gap: मखाना एक ऐसा ड्राई फ्रूट है जो सेहत और स्वाद दोनों का खजाना है. इसे भारत में सदियों से खाया जा रहा है और यह आज भी हर घर की रसोई में आसानी से मिल जाता है. फॉक्स नट्स, या मखाना, न सिर्फ भूख मिटाता है बल्कि एनर्जी और ताकत भी देता है. फाइबर, मैग्नीशियम, पोटैशियम और कैल्शियम जैसे न्यूट्रिएंट्स इसे सुपरफूड बनाते हैं. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि दुनिया का लगभग 90% मखाना बिहार के तालाबों और वेटलैंड्स से आता है? कभी व्रत का एक साधारण खाना और लोकल रस्मों का एक जरूरी हिस्सा, यह पानी का बीज आज एक ग्लोबल सुपरफूड बन गया है. इसे इसके न्यूट्रिशन से भरपूर होने और हल्के क्रंच के लिए पसंद किया जाता है. दुनिया भर में बढ़ती डिमांड और आसमान छूती कीमतों के साथ, मखाना अब सिर्फ़ एक स्नैक से कहीं ज़्यादा हो गया है.
किसान को नहीं मिलता मेहनत का पूरा लाभ
तालाब से थाली तक, मुनाफ़ा किसान तक पहुंचने से पहले ही गायब हो जाता है. बिहार भारत का 85% मखाना पैदा करता है, फिर भी किसानों को 1 किलों मखाने पर सिर्फ 80 रुपये मिलते है, गुस्सा तो जब फूटता है जब किसान बताते है कि जब वह बाजर में 8 किलों बेचने जाते है तो उन्हें सिर्फ 5 किलों का ही पैसा मिलता है. वहीं, 8KG के लिए सिर्फ़ ₹400 मिलते हैं, जबकि हम इसे ₹2,000 प्रति KG पर खरीदते हैं. राज्य में कोई प्रोसेसिंग यूनिट नहीं है. कोई सही कीमत नहीं है. सिर्फ़ बिचौलिए और एक ऐसा सिस्टम जो शोषण को इनाम देता है. जब बिहार मखाना प्रोडक्शन में ग्लोबल लीडर है, तो इसके किसान अभी भी ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष क्यों कर रहे हैं?
क्या है वजह?
दरभंगा में मखाना रिसर्च सेंटर (MRC) के हेड और प्रिंसिपल साइंटिस्ट इंदु शेखर सिंह ने ने मखाना की खेती के एरिया में ठहराव के कई कारण बताए और कहा कि क्लाइमेट चेंज, लिमिटेड टेक्नोलॉजी और लेबर-इंटेंसिव प्रोसेसिंग, साथ ही यह बात कि खेती सिर्फ मल्लाह कम्युनिटी तक ही सीमित है, इंडस्ट्री की ग्रोथ पर असर डाल रहे हैं.
कच्चा मखाना अक्सर पश्चिम बंगाल, दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के व्यापारियों को बेचा जाता है, जहां प्राइवेट कंपनियां सफाई, भूनने, स्वाद बढ़ाने और पैकेजिंग के स्टेज मैनेज करती हैं. ये राज्य फिर फ़ाइनल प्रोडक्ट को प्रीमियम ब्रांड के नाम पर बेचते हैं, जिससे मुनाफ़ा होता है जिससे बिहार की लोकल इकॉनमी मजबूत होनी चाहिए थी.