पटना हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया कि पहली पत्नी की सहमति से शादी करने वाली दूसरी पत्नी भी फैमिली पेंशन की हकदार है. कोर्ट ने रद्द किया विभाग का 2019 का आदेश.
क्या अब दूसरी पत्नी भी होगी पेंशन की हकदार?
भारतीय कानून और समाज में अक्सर ‘दूसरी पत्नी’ के अधिकारों को अनदेखा किया जाता रहा है, लेकिन पटना हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने ऐसी अनगिनत महिलाओं की उम्मीदों को नए पंख दिए हैं. अदालत ने एक मृत सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए साफ किया कि किसी भी महिला को बुढ़ापे में गरिमा के साथ जीने से वंचित नहीं किया जा सकता, साथ ही वर्षों से रोकी गई फैमिली पेंशन भुगतान करने का आदेश भी दिया. आइए आपको बताते हैं आखिर पूरा मामला क्या है…
दरअसल, पटना हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए दिवंगत सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी को फैमिली पेंशन पाने का हकदार माना है. अदालत ने बिहार सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1976 के नियम 23(2) की व्याख्या करते हुए साफ किया कि यह नियम दूसरी शादी पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाता, बल्कि सरकार को इसके लिए अनुमति देने का अधिकार देता है. न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने मोसमात कुसुम देवी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया.
हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता द्वारा 5 फरवरी 2019 को जारी उस आदेश (ज्ञापांक 327) को रद्द कर दिया, जिसके तहत कुसुम देवी को पेंशन देने से मना कर दिया गया था. अदालत ने विभाग को निर्देश दिया कि वह मृतक कर्मचारी जय लाल साह की दूसरी पत्नी को 17 अप्रैल 2009 (पति की मृत्यु की तारीख) से ही पारिवारिक पेंशन का भुगतान करे.
सीतामढ़ी की रहने वाली कुसुम देवी स्वर्गीय जय लाल साह की दूसरी पत्नी हैं. सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि पहली शादी से जय लाल साह की कोई संतान नहीं थी. इसी वजह से उन्होंने 28 फरवरी 1982 को विभाग में आवेदन देकर दूसरी शादी की इजाजत मांगी थी. उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनकी पहली पत्नी को इस शादी से कोई आपत्ति नहीं है और दोनों महिलाएं एक साथ ही रहती थीं. पति के निधन के कुछ महीने बाद, 10 दिसंबर 2009 को पहली पत्नी का भी देहांत हो गया था.
अदालत ने माना कि वित्त विभाग के 6 सितंबर 1996 के संकल्प (संख्या 10059) के अनुसार सामान्य तौर पर दूसरी पत्नी को पेंशन का अधिकार नहीं होता, हालांकि उनके नाबालिग बच्चे इसके हकदार होते हैं. लेकिन इस मामले में स्थिति अलग थी; कर्मचारी ने सेवा में रहते हुए ही दूसरी शादी की अनुमति के लिए आवेदन किया था, जिस पर विभाग ने कभी विचार ही नहीं किया.
हाईकोर्ट ने पाया कि मुख्य अभियंता का 2019 का आदेश नियम 23(2) के प्रावधानों के विपरीत था. सुप्रीम कोर्ट के राधा देवी मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत पूर्ण न्याय के लिए दिए गए निर्देश बाध्यकारी नजीर नहीं बनते. हालांकि, वर्तमान मामले में पहली पत्नी की मौत के बाद से याचिकाकर्ता ही एकमात्र जीवित जीवनसाथी (स्पॉउस) बची हैं. ऐसे में उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. अदालत ने विभाग को कानून के मुताबिक जल्द से जल्द पेंशन की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया.
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