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Tamil Nadu: गुरुवार सुबह सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों द्वारा चुनाव पूर्व फ्री सहायता देने की प्रथा की कड़ी आलोचना की है. अदालत ने कड़े शब्दों में पूछा कि अगर राज्य सरकारें मुफ्त भोजन और बिजली देना जारी रखती हैं, तो वे वास्तविक विकास के लिए फंड कहां से लाएंगी.
घाटे में बजट और करोड़ों की सब्सिडी
चुनाव से पहले तमिलनाडु सरकार द्वारा अपने लोगों को उनकी आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना फ्री में बिजली देने के प्रस्ताव को़ उन राज्यों पर टिप्पणी है जो बजट घाटे में चल रहे हैं और विकास के लिए धन की कमी की शिकायत करते हुए सब्सिडी पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है.
भुगतान करने में सक्षम लोगों को फ्री सुविधा
अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा है कि ‘मुफ्त चीजों’ का अंधाधुंध वितरण, खासकर उन लोगों के लिए जो उपयोगिताओं और सेवाओं के लिए भुगतान करने में सक्षम हैं. इसने ऐसी संस्कृति को जन्म दिया है जो काम न करने के लिए पुरस्कृत करती हुई प्रतीत होती है.
अदालत ने राज्य सरकार से यह भी पूछा कि इस योजना की घोषणा अंतिम समय में क्यों की गई, जिससे बिजली वितरण कंपनियों को टैरिफ और बजट गणनाओं को समायोजित करने के लिए अफरा-तफरी मच गई.
सक्षम और अक्षम लोगों के बीच बिना भेदभाव के वितरण
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘कल्याणकारी व्यवस्था के तहत उन लोगों के लिए प्रावधान करना समझ में आता है जो भुगतान करने में समर्थ नहीं हैं. लेकिन अगर आप सक्षम और अक्षम लोगों के बीच बिना किसी तरह के भेदभाव के वितरण करते हैं.’
राजस्व का एक चौथाई हिस्सा विकास कार्यों में
मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, “ऐसे बच्चे हैं जो शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते. ऐसे में राज्य को शिक्षा प्रदान करनी चाहिए. यह हर राज्य का कर्तव्य है. लेकिन जो लोग धनी हैं, उन्हें मिलने वाली किसी भी प्रकार की मुफ्त सुविधा सबसे पहले उनकी जेब में जाती है. क्या अब राज्यों के लिए इन नीतिगत ढांचों पर पुनर्विचार करने का समय नहीं आ गया है?” उन्होंने कहा कि प्रत्येक राज्य के राजस्व का कम से कम एक चौथाई हिस्सा विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए.
राज्य सरकारों के पास विकास के लिए पैसे नहीं
अदालत ने तमिलनाडु सरकार से कहा कि, ‘राज्य सरकारों की ऐसी नीतियों के कारण विकास के लिए एक पैसा भी नहीं बचा है. यह सभी राज्यों की समस्या है, सिर्फ आपके राज्य की नहीं’
न्यायाधीश जॉयमाल्य बागची, जो बेंच में शामिल थे, ने नियोजित और अनियोजित व्यय के बारे में एक महत्वपूर्ण बात कही और सुझाव दिया कि जो राज्य मुफ्त चीजें वितरित करना चाहते हैं, वे “इसे अपने बजट आवंटन में शामिल करें और यह बताएं कि आप ऐसा कैसे करेंगे. फ्री की चीजों पर होने वाले अत्यधिक खर्च की जांच करना महत्वपूर्ण है’
क्या है मामला?
कोर्ट में तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिसमें विद्युत संशोधन नियम 2024 के नियम 23 को रद्द करने की मांग थी, इस आधार पर कि यह ‘मनमाना, अनुचित, अव्यवहारिक, असंवैधानिक, अवैध, अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करने वाला और विद्युत अधिनियम, 2003 के प्रावधानों के विरुद्ध है.
नियम 23 स्वीकृत वार्षिक राजस्व आवश्यकता और स्वीकृत शुल्कों से अनुमानित वार्षिक राजस्व के बीच के अंतर को नियंत्रित करता है। न्यायालय ने कहा कि यदि इन सब्सिडी की घोषणा पहले से कर दी गई होती, तो वितरण कंपनियों के वित्तीय अनुमानों में इन्हें शामिल किया जा सकता था. अदालत ने तमिलनाडु सरकार को अपने सवालों का जवाब देने का निर्देश दिया है. मतलब, फ्री बिजली देने के अपने वादे को पूरा करने के लिए उसे फंड कहां से मिल रहा है. इस मामले में केंद्र को भी नोटिस जारी किया गया.