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तीज की कोथली हरियाणा की प्राचीन परंपरा : हरियाली तीज की कोथली में फिरनी और घेवर की देते हैं खास मिठाई, जानें क्या होती है ‘कोथली’

सावन का महीना चल रहा है जो हिंदू धर्म के लोगों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण महीना माना जाता है। इस महीने में विशेष तौर पर महादेव की पूजा अर्चना की जाती है और इस महीने में ही शिवरात्रि का पर्व भी आता है। सावन के महीने में महादेव की पूजा अर्चना करने के साथ-साथ एक और पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

करनाल-इशिका ठाकुर, India News (इंडिया न्यूज), Hariyali Teej 2025 : सावन का महीना चल रहा है जो हिंदू धर्म के लोगों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण महीना माना जाता है। इस महीने में विशेष तौर पर महादेव की पूजा अर्चना की जाती है और इस महीने में ही शिवरात्रि का पर्व भी आता है। सावन के महीने में महादेव की पूजा अर्चना करने के साथ-साथ एक और पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। सावन के महीने में आने वाली हरियाली तीज का हरियाणा में एक अलग महत्व है हरियाली तीज चारों तरफ हरियाली होने के चलते मनाई जाती है और इस दिन महिलाएं झूला झूलती हैं और गीत गाती हैं और विशेष तौर पर इस हरियाली तीज पर बहन के लिए भाई कोथली लेकर जाते हैं जो हरियाणा की प्राचीन परंपरा है। 

क्या होती है कोथली

हरियाणा में कोथली का विशेष महत्व होता है और सावन के महीने में तीज के अवसर पर दी जाने वाली कोथली सबसे अहम मानी जाती है। तीज की पोटली में जो बहन विवाहित होती है उसके लिए भाई कोथली लेकर जाता है। जिसमें मिठाई के तौर पर विशेष रूप से घेवर और फिरनी को शामिल किया जाता है । उसके साथ-साथ पोटली में खाने के व्यंजन के तौर पर मटर, सुहाली, बिस्किट, पतासे आदि भी शामिल किए जाते हैं। इस अवसर पर खाने के व्यंजन के साथ-साथ बहन और उसके परिवार के लिए उपहार के तौर पर नए वस्त्र दिए जाते हैं तो बहन के सिंगार के लिए सम्मान भी दिया जाता है और इसको ही हरियाणा में तीज की कोथली कहा जाता है।

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फिरनी और घेवर व्यंजन का होता है विशेष महत्व

कोथली के लिए विशेष तौर पर घेवर और फिरने की स्टॉल लगाकर यह व्यंजन बेचने वाले दुकानदार ने बताया कि तीज की कोथली में व्यंजन के तौर पर कई व्यंजनों को शामिल किया जाता है। लेकिन सबसे ज्यादा जो प्रमुख व्यंजन होता है वह फिरनी और घेवर होता है जो केवल सावन के महीने में ही बनाया जाता है। इसका स्वाद खाने में लाजवाब होता है जो देसी घी में बनाई जाती है और उनके ऊपर मावा और ड्राई फ्रूट भी लगाए जाते हैं। 

हरियाणा में कैथल जिले के पूंडरी की फिरनी सबसे मशहूर फिरनी है। जिसकी विदेश में भी डिमांड रहती है इसी के चलते पुंडरी की फिरनी उत्तरी भारत के साथ-साथ पूरे हरियाणा में खाने के लिए लेकर  जाते है या कुछ लोग यहां से खरीद कर अपने-अपने क्षेत्र में हरियाली तीज की कोथली के लिए बेचने के लिए स्टॉल भी लगते हैं। फिरनी सावन के महीने में तीज की कोथली के लिए विशेष व्यंजन होता है जो सिर्फ इस महीने ही बनाया जाता है।

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प्राचीन समय से चलती आ रही कोथली देने की परंपरा

फिरनी और घेवर की स्टॉल पर आए कुछ बुजुर्ग महिलाएं घेवर और फिरनी लेने के लिए यहां पर पहुंची हुई थी। उन्होंने कहा कि यह रीति रिवाज और परंपरा हमारे बड़े बुजुर्गों के समय से अधिक चलती आ रही है जहां विवाहित बेटियों की तीज की कोथली दी जाती है। इसमें विशेष तौर पर खाने के व्यंजन दिए जाते हैं जिसमें घेवर और फिरनी प्रमुख होती है वहीं बेटी और उसके परिवार के लिए उपहार के तौर पर नए वस्त्र दिए जाते हैं और यह भाई और बहन के प्रेम का प्रतीक होता है भाई बड़े चाव से अपनी बहन की कोथली लेकर जाते हैं। और यह परंपरा सदियों से चलती आ रही है जो अभी निभाई जा रही है।

कोथली से बहन भाई का मनमुटाव होता है दूर

रामनिवास शर्मा ने कहा कि यह कोथली हमारे बुजुर्गों के समय से चलती आ रही है और कोथली में बहन और बहनोई के नए कपड़े, बहन के लिए श्रृंगार का सामान, साथ ही विशेष तौर पर हमारे बुजुर्ग द्वारा खाने के व्यंजन के तौर पर फिरनी और घेवर को शामिल किया गया था। उन्होंने कहा था इसका भी एक कारण है कि इस महीने में घी से बने हुए व्यंजन खाना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है और फिरनी और घेवर को देसी घी में बनाया जाता है इसलिए इस व्यंजन का सावन के महीने में विशेष महत्व होता है और यह केवल इस महीने में ही बनाए जाते हैं।

उन्होंने कहा कि भाई और बहन में अगर किसी बात को लेकर लड़ाई झगड़ा या मनमुटाव हो जाता है तो भाई अपनी बहन की तीज की कोथली लेकर जाते हैं जिससे मनमुटाव भी दूर होता है। प्यार के प्रतीक कोथली से टूटे हुए रिश्ते बन जाते हैं और जब भाई बहन की कोथली लेकर जाता है तो उसमें जो खाने के व्यंजन दिए जाते हैं उसको अपने परिवार और पड़ोस में थोड़ा-थोड़ा बांटा जाता है, जिससे उनके आसपास के मनमुटाव भी दूर होते हैं और सभी में प्यार बना रहता है इसलिए यह प्यार का पर्व है और भाई बहन के अटूट रिश्ते के तौर पर भी इस तीज की कोथली को दिया जाता है। हमारे बड़े बुजुर्गों के समय से चलती आ रही इस परंपरा को अभी भी निभाया जा रहा है।

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