धमतरी में किसान के 16 सागा पेड़ो को गैरकानूनी तरीके से काटा गया। 8 साल से ज्यादा चली कानूनी लड़ाई में पीड़ित किसान को कोई मुआवजा नहीं मिला। अपितु कोर्ट के द्वारा गैरकानूनी ढंग से पेड़ काटने का मामला उजागर हो चुका है। लेकिन किसान को मिली तो बस "तारीख" !
धमतरी: 8 साल 6 माह की कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद भी किसान को कोई मुआवज़ा नहीं मिला, मिली तो बस तारीख. धमतरी जिले के कुरूद अनुविभाग से यह मामला सामने आया। जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं. यह मामला ग्राम थूहा के किसान तोरन सिंह साहू को अपने खेत की मेड़ पर लगे 16 साजा पेड़ों की अवैध कटाई और फसल नुकसान के मामले में करीब 8 वर्ष 6 माह तक न्यायालयों और सरकारी दफ्तरों के के चक्कर लगाने पड़े, लेकिन आखिरकार उन्हें न पेड़ो का मुआवजा मिला और न ही फसल नुकसान की भरपाई. इन सबके बीच एसडीएम न्यायालय कुरूद ने आरोपियों पर केवल 16 हजार का जुर्माना लगाकर केस को रफा-दफा कर दिया गया.
मामले के अनुसार किसान तोरन सिंह ने शिकायत दर्ज कराई थी कि बहोरन मुर्रे, रेवेन्द्र सिंह, ऐरावत मुर्रे सहित अन्य लोगों ने उसकी भूमि खसरा नंबर 75/1 की मेड़ पर लगे साजा प्रजाति के 16 हरे-भरे पेड़ों की बिना अनुमति काटकर ट्रेक्टर क्रमांक CG 05 AD 3017 से परिवहन किया. किसान का यह भी आरोप है कि इस दौरान उसकी सरसों की फसल भी पूरी तरह बर्बाद कर दी गई. बड़ा सवाल यह भी है कि आरोपियों में शामिल ऐरावत मुर्रे कुरूद में ही वन विभाग में डिप्टी रेंजर के पद पर कार्यरत हैं, जिन पर स्वयं पेड़ो की रक्षा की जिम्मेदारी हो वो अगर इस तरह का कृत्य करें तो इस पर सवाल उठना लाज़मी हैं.
प्रारंभिक जांच में 16 पेड़ों के ठूंठ मिलने की पुष्टि हुई थी, लेकिन दिसंबर 2021 में एसडीएम न्यायालय ने साक्ष्य के अभाव में मामले को निरस्त कर दिया था. इसके बाद किसान ने अपर कलेक्टर धमतरी में अपील की, जहाँ अप्रैल 2023 में आदेश को त्रुटिपूर्ण बताते हुए पुन: सुनवाई के निर्देश दिए गए. जिसके अन्तर्गत यह मामला आयुक्त रायपुर संभाग पहुँचा, जहाँ जुलाई 2025 में आरोपियों की अपील भी खारिज कर दी गई. इसके बाद दोबारा सुनवाई करते हुए फरवरी 2026 में एसडीएम न्यायालय ने माना कि 16 साजा वृक्षों की कटाई बिना प्रशासनिक अनुमति के की गई थी और यह छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 240,241 एवं 253 का उल्लंघन है.
एसडीएम कुरूद का कहना है कि प्रकरण में छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों के तहत विधि अनुसार कार्रवाई की गई है. न्यायालय द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर निर्णय पारित किया गया है।.
न्यायालय ने प्रति वृक्ष 1000 रूपये के हिसाब से कुल 16,000 रूपये का जुर्माना आरोपियों पर लगाया, लेकिन यह राशि शासन के खाते में जमा होगी. आदेश में कहीं भी पीड़ित किसान को आर्थिक क्षतिपूर्ति देने का उल्लेख नहीं किया गया. इतने वर्षो तक चली अदालती लड़ाई में किसाान का समय, पैसा और मानसिक पीड़ा का का कोई भी उल्लेख नहीं किया गया. सवाल यह है कि जब पेड़ कटाई और नियम उल्लंघन सिद्ध हो चुका है, तो आखिर पीड़ित किसान को उसका हक क्यों नहीं मिला?
पीड़ित किसान तोरन सिंह का कहना है कि उसने न्याय व्यवस्था पर भरोसा कर इतने वर्षों तक संघर्ष किया, लेकिन मिली तो बस तारीख. पीड़ित किसान ने कहा कि इस तरह के न्याय से कानून व्यवस्था पर से उनका विश्वास टूट गया है. जो कि सामाजिक नजरिये से बिल्कुल ठीक नहीं है. आर्थिक और मानसिक रूप से टूट चुके किसान ने प्रशासन से वास्तविक नुकसान की भरपाई और उच्च स्तरीय जांच की मांग की है. वहीं उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन, प्रभावशाली लोगों के हाथ की कठपुतली मात्र बनकर रह गई है. जिसका न्याय से कोई भी सरोकार नहीं है.
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