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संभल मस्जिद मामला: नमाजियों पर पाबंदी रद्द, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने की सख्त टिप्पणी- ‘नहीं संभाल सकते कानून तो इस्तीफा दें…’

संभल नमाज़ विवाद: हाई कोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश प्रशासन के उस फ़ैसले को रद्द कर दिया, जिसमें संभल ज़िले की एक मस्जिद में रमज़ान के दौरान नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित कर दी गई थी.

Written By: Shristi S
Last Updated: 2026-03-14 15:41:05

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Allahabad HC on Sambhal Mosque Case: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश प्रशासन के उस फ़ैसले को रद्द कर दिया, जिसमें संभल ज़िले की एक मस्जिद में रमज़ान के दौरान नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित कर दी गई थी. कोर्ट ने कहा कि क़ानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की ज़िम्मेदारी है.
 
27 फ़रवरी को दिए गए एक आदेश में, जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने टिप्पणी की कि अगर पुलिस अधीक्षक और ज़िला कलेक्टर को क़ानून-व्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा है और इसलिए वे नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें या तो इस्तीफ़ा दे देना चाहिए या अपना तबादला करवा लेना चाहिए, अगर वे क़ानून का राज लागू करने में असमर्थ हैं.
 

पद से इस्तीफा दे देना चाहिए- इलाहाबाद हाई कोर्ट

राज्य सरकार के वकील ने कहा है कि क़ानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए, नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित करने का ऐसा आदेश जारी किया गया है. हम राज्य सरकार के वकील की इस दलील को सिरे से ख़ारिज करते हैं. यह राज्य का फ़र्ज़ है कि वह हर हाल में क़ानून का राज सुनिश्चित करे.
 
कोर्ट ने टिप्पणी की अगर स्थानीय अधिकारियों, यानी पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर को लगता है कि क़ानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है, जिसके चलते वे परिसर के अंदर नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें या तो अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए या संभल से बाहर अपना तबादला करवा लेना चाहिए, अगर उन्हें लगता है कि वे क़ानून का राज लागू करने में सक्षम नहीं हैं.
 
कोर्ट ने आगे कहा कि यह राज्य का फ़र्ज़ है कि वह सुनिश्चित करे कि हर समुदाय अपने तय पूजा स्थल पर शांतिपूर्वक पूजा-अर्चना कर सके; और अगर वह कोई निजी संपत्ति है, जैसा कि कोर्ट पहले भी कह चुका है, तो वे राज्य की बिना किसी अनुमति के पूजा कर सकें.
 

मुनाजिर खान ने दायर करवाई थी याचिका

ये टिप्पणियां मुनाज़िर ख़ान द्वारा दायर एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान की गईं. याचिका में आरोप लगाया गया था कि उन्हें रमज़ान के महीने में गाटा संख्या 291 पर नमाज़ पढ़ने से रोका जा रहा है, जहां उनका दावा है कि एक मस्जिद मौजूद है.
 
याचिकाकर्ता के अनुसार, अधिकारियों ने परिसर में नमाज़ पढ़ने के लिए केवल बीस लोगों को अनुमति दी थी, जबकि रमज़ान के दौरान वहाँ बड़ी संख्या में लोगों के इकट्ठा होने की उम्मीद थी.
 

राज्य सरकार ने बचाव में क्या कहा?

राज्य सरकार ने इस पाबंदी का बचाव करते हुए कहा कि नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित करने का फ़ैसला क़ानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के चलते लिया गया था. हालांकि, बेंच ने राज्य सरकार द्वारा दी गई इस सफ़ाई को ख़ारिज कर दिया. कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि यह राज्य का फ़र्ज़ है कि वह हर हाल में क़ानून का राज सुनिश्चित करे और यह भी सुनिश्चित करे कि हर समुदाय शांतिपूर्वक अपने धर्म का पालन कर सके. अदालत ने आगे यह भी साफ़ किया कि राज्य की अनुमति केवल तभी जरूरी होती है, जब धार्मिक गतिविधियां सार्वजनिक ज़मीन पर की जा रही हों या जब वे सार्वजनिक संपत्ति तक फैल जाएं.
 
सुनवाई के दौरान, राज्य ने संपत्ति के संबंध में याचिकाकर्ता के दावे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, यह ज़मीन सुखी सिंह के बेटों – मोहन सिंह और भूराज सिंह के नाम पर दर्ज है. अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने अभी तक ऐसी कोई तस्वीर पेश नहीं की है, जिससे उस मस्जिद या पूजा स्थल के अस्तित्व की पुष्टि हो सके, जहां नमाज़ अदा की जानी थी.
 

मुनाज़िर ख़ान ने दस्तावेज पेश करने के लिए समय मांगा

याचिकाकर्ता मुनाज़िर ख़ान  ने संबंधित स्थल की तस्वीरें और राजस्व दस्तावेज़ रिकॉर्ड पर पेश करने के लिए समय मांगा, जबकि राज्य ने आगे के निर्देश प्राप्त करने के लिए समय की मांग की. अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 मार्च की तारीख तय की है.

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Written By: Shristi S
Last Updated: 2026-03-14 15:41:05

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Allahabad HC on Sambhal Mosque Case: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश प्रशासन के उस फ़ैसले को रद्द कर दिया, जिसमें संभल ज़िले की एक मस्जिद में रमज़ान के दौरान नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित कर दी गई थी. कोर्ट ने कहा कि क़ानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की ज़िम्मेदारी है.
 
27 फ़रवरी को दिए गए एक आदेश में, जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने टिप्पणी की कि अगर पुलिस अधीक्षक और ज़िला कलेक्टर को क़ानून-व्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा है और इसलिए वे नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें या तो इस्तीफ़ा दे देना चाहिए या अपना तबादला करवा लेना चाहिए, अगर वे क़ानून का राज लागू करने में असमर्थ हैं.
 

पद से इस्तीफा दे देना चाहिए- इलाहाबाद हाई कोर्ट

राज्य सरकार के वकील ने कहा है कि क़ानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए, नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित करने का ऐसा आदेश जारी किया गया है. हम राज्य सरकार के वकील की इस दलील को सिरे से ख़ारिज करते हैं. यह राज्य का फ़र्ज़ है कि वह हर हाल में क़ानून का राज सुनिश्चित करे.
 
कोर्ट ने टिप्पणी की अगर स्थानीय अधिकारियों, यानी पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर को लगता है कि क़ानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है, जिसके चलते वे परिसर के अंदर नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें या तो अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए या संभल से बाहर अपना तबादला करवा लेना चाहिए, अगर उन्हें लगता है कि वे क़ानून का राज लागू करने में सक्षम नहीं हैं.
 
कोर्ट ने आगे कहा कि यह राज्य का फ़र्ज़ है कि वह सुनिश्चित करे कि हर समुदाय अपने तय पूजा स्थल पर शांतिपूर्वक पूजा-अर्चना कर सके; और अगर वह कोई निजी संपत्ति है, जैसा कि कोर्ट पहले भी कह चुका है, तो वे राज्य की बिना किसी अनुमति के पूजा कर सकें.
 

मुनाजिर खान ने दायर करवाई थी याचिका

ये टिप्पणियां मुनाज़िर ख़ान द्वारा दायर एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान की गईं. याचिका में आरोप लगाया गया था कि उन्हें रमज़ान के महीने में गाटा संख्या 291 पर नमाज़ पढ़ने से रोका जा रहा है, जहां उनका दावा है कि एक मस्जिद मौजूद है.
 
याचिकाकर्ता के अनुसार, अधिकारियों ने परिसर में नमाज़ पढ़ने के लिए केवल बीस लोगों को अनुमति दी थी, जबकि रमज़ान के दौरान वहाँ बड़ी संख्या में लोगों के इकट्ठा होने की उम्मीद थी.
 

राज्य सरकार ने बचाव में क्या कहा?

राज्य सरकार ने इस पाबंदी का बचाव करते हुए कहा कि नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित करने का फ़ैसला क़ानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के चलते लिया गया था. हालांकि, बेंच ने राज्य सरकार द्वारा दी गई इस सफ़ाई को ख़ारिज कर दिया. कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि यह राज्य का फ़र्ज़ है कि वह हर हाल में क़ानून का राज सुनिश्चित करे और यह भी सुनिश्चित करे कि हर समुदाय शांतिपूर्वक अपने धर्म का पालन कर सके. अदालत ने आगे यह भी साफ़ किया कि राज्य की अनुमति केवल तभी जरूरी होती है, जब धार्मिक गतिविधियां सार्वजनिक ज़मीन पर की जा रही हों या जब वे सार्वजनिक संपत्ति तक फैल जाएं.
 
सुनवाई के दौरान, राज्य ने संपत्ति के संबंध में याचिकाकर्ता के दावे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, यह ज़मीन सुखी सिंह के बेटों – मोहन सिंह और भूराज सिंह के नाम पर दर्ज है. अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने अभी तक ऐसी कोई तस्वीर पेश नहीं की है, जिससे उस मस्जिद या पूजा स्थल के अस्तित्व की पुष्टि हो सके, जहां नमाज़ अदा की जानी थी.
 

मुनाज़िर ख़ान ने दस्तावेज पेश करने के लिए समय मांगा

याचिकाकर्ता मुनाज़िर ख़ान  ने संबंधित स्थल की तस्वीरें और राजस्व दस्तावेज़ रिकॉर्ड पर पेश करने के लिए समय मांगा, जबकि राज्य ने आगे के निर्देश प्राप्त करने के लिए समय की मांग की. अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 मार्च की तारीख तय की है.

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