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Kanshi Ram Political History: उत्तर प्रदेश विधानसभा 2027 को लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल काफी तेज हो गई है, दलित वोट बैंक साधने के लिए हर कोई बहुजन समाज पार्टी के गठन करने वाले कांशीराम के नाम पर दांव खेल रहा है. चाहे वह पार्टी समाजवादी हो, भाजपा या फिर कांग्रेस हर किसी को इस वक्त कांशीराम की याद आ रही हैं.
रविवार को कांशीराम की जंयती है और इस मौके पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उस दिन को PDA (पिछड़ा, दलित, और अल्पसंख्यक) दिवस मनाने की घोषणा की है. ऐसे में यह जानना काफी दिलचस्प हो जाता है कि आखिर कांशी राम कौन थे? उत्तर प्रदेश पर उनका प्रभाव क्या था वे मुख्यमंत्री क्यों नहीं बने, और मायावती के साथ उनके समीकरण क्या थे.
कौन थे कांशीराम?
कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रूपनगर जिल में एक दलित परिवार में हुआ था. उन्हें दलित राजनीति का वह रणनीतिकार माना जाता है जिसने भारत में बहुजन राजनीति को संगठित रूप दिया. उन्होंने दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों को राजनीतिक रूप से जागरूक करने का अभियान चलाया और इसी मिशन से आगे चलकर 1984 में बहुजन समाज पार्टी का गठन किया.
कांशीराम ने अपनी राजनीति को केवल सत्ता हासिल करने का एक ज़रिया नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक बदलाव का एक माध्यम बना दिया. 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो बदलाव देखने को मिला—एक ऐसा दौर जब दलित समुदाय पहली बार सत्ता के केंद्र तक पहुंचा उसकी नींव स्वयं कांशीराम ने ही रखी थी.
दलित राजनीति के चेहरे के रूप में कांशीराम का उदय
कांशीराम ने दलित और पिछड़े वर्गों को संगठित करने के लिए कई संगठनों की स्थापना की, जिसमें BAMCEF (पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक समुदाय कर्मचारी महासंघ) 1978 में DS-4 (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) 1981 में और बहुजन समाज पार्टी की स्थापना 1984 में की. उन्होंने यह भी ‘नारा किया कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’. इस नारे ने दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों में राजनीतिक जागरूकता पैदा की और उन्हें वोट की ताकत का एहसास कराया.
उत्तर प्रदेश की राजनीति पर कांशीराम का क्या प्रभाव था?
कांशीराम ने अपनी राजनीतिक रणनीति का केंद्र उत्तर प्रदेश को बनाया. 1990 के दशक में यूपी की राजनीति में जातीय समीकरण तेजी से बदले लगे. कांशीराम की रणनीति के कारण दलित नोट बैंक पहली बार बड़े पैमान पर एकजुट हुआ. इस दौरान दलित वर्ग राजनीतिक रूप से संगठित हुई, बहुजन राजनीति मुख्यधारा में आई और यूपी में सत्ता का समीकरण बदला. 1993 में समाजवादी पार्टी और बीएसपी के गठबंधन ने भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया, जो उस समय एक बड़ा राजनीतिक बदलाव माना गया.
कांशीराम कभी भी मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनें?
अब सबसे जरूरी सवाल यह खड़ा होता है कि कांशीराम इतने प्रसिद्ध होने के बावजूद भी कभी मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन पाए. वह बहुजन आंदोलन के सबसे बड़े नेता थे, उनके मुख्यमंत्री न बनने के भी कई कारण है:
रणनीतिक भूमिका – खुद को सत्ता के पदों पर काबिज़ होने की चाह रखने वाले एक व्यक्ति के तौर पर देखने के बजाय, कांशी राम ने खुद को एक संगठक और रणनीतिकार के रूप में देखा.
आंदोलन पर ज़ोर – उनका मानना था कि उनका मुख्य उद्देश्य बहुजन आंदोलन को मज़बूत करना है.
नेतृत्व की एक नई पीढ़ी तैयार करना – उनकी यह आकांक्षा थी कि दलित समुदाय से नए नेता उभरें और सत्ता के शिखर तक पहुंचें.
इसी दर्शन से प्रेरित होकर, उन्होंने मायावती को मार्गदर्शन दिया और उन्हें उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रमुख हस्ती के रूप में स्थापित किया.
कांशीराम और मायवती का समीकरण
कांशीराम और मायावती का रिश्ता भारतीय राजनीति में एक अनोखा उदाहरण माना जाता है. कांशीराम ने मायावती की राजनीतिक क्षमता को पहचान लिया था. उन्होंने मायवाती को राजनीति में आगे बढ़ाने का काम किया और सार्वजनिक तौर से कहा था कि मायावती मेरी राजनीतिक उत्तराधिकारी है. यही कारण था कि कांशीराम ने मायावती को आगे बढ़ाया और जब BSP के सत्ता के आने के बाद उन्होंने मायावती को मुख्यमंत्री के दौर पर आगे बढ़ाया. 1995 में मायावती पहली बार यूपी की सीएम बनीं और दलित राजनीति को सत्ता के केंद्र तक पहुंचाया. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि कांशीराम की रणनीति और मायावती की नेतृत्व क्षमता ने BSP को यूपी की प्रमुख राजनीतिक ताकत बना दिया.