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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (AGAG) की कंपनियों द्वारा कथित तौर पर लिए गए 40,000 करोड़ रुपये से अधिक के बैंक ऋण धोखाधड़ी की जांच में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से हो रही “अकारण देरी” से नाराजगी जताई है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और ईडी को निष्पक्ष और त्वरित जांच का निर्देश दिया है
जनहित याचिका दायर करने वाले पूर्व नौकरशाह EAS सरमा ने https://indianews.in/tag/anil-ambani/ के देश छोड़कर भागने की उम्मीद की है. इस पर अंबानी की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने आश्वासन दिया कि वह अदालत की इजाजत के बिना देश नहीं छोड़ेंगे.
सुप्रीम कोर्ट के बेंच ने कहा कि ED सीनियर अधिकारियों की एक SIT बनाए, ताकि चल रही जांच को एक सही तरीके से नतीजे तक पहुंचाया जा सके. साथ ही न्यायालय ने अनिल अंबानी के विदेश जाने पर भी रोक लगा दी है. यह आदेश तब आया है जब यह आशंका जताई गई थी कि अंबानी अपने खिलाफ जांच पूरी होने से पहले भारत से भाग सकते हैं. हालांकि, सुनवाई के दौरान अनिल अंबानी की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि उनके क्लाइंट कोर्ट की इजाजत के बिना देश नहीं छोड़ेंगे.
40 हजार करोड़ रुपए की धोखाधड़ी
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि ADAG समूह की विभिन्न कंपनियों के माध्यम से कथित तौर पर गबन की गई कुल राशि लगभग 40,000 करोड़ रुपए है.
बेंच ने ED के हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि रिलायंस कम्युनिकेशंस के ऋण 40,000 करोड़ रुपए से ज्यादा हैं और जांच एजेंसी ने अपराध से प्राप्त आय का आकलन 20,000 करोड़ रुपए से अधिक किया है.
मुख्य महासचिव ने आगे बताते हुए कहा कि ED और CBI ने जांच के संबंध में अपनी अलग-अलग स्थिति रिपोर्ट दाखिल कर दी हैं.
सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि FIR स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शिकायत के आधार पर दर्ज थी, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि अन्य बैंकों की शिकायतों के संबंध में अलग-अलग FIR क्यों दर्ज नहीं हुए. पहली FIR स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से मिली थी. इसके बाद, अन्य बैंकों ने भी हमें कथित गबन के बारे में बताया. वे भी अब उसी FIR का हिस्सा हैं.