Ganesh Chaturthi 2026 Vrat Kahani: आज माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि है, इसलिए आज गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जा रहा है. इस पर्व को भगवान गणेश के जन्मोत्सव कहा जाता है, इसलिए इसे गणेश जयंती और विनायक चतुर्थी भी कहते हैं. आज के दिन लोग गणेश भगवान की पूजा करते है और व्रत भी रखते हैं, मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति आज गणेश जी की विधि विधान से पूजा करता है, उसके सारे दूख दर्द भगवान हर लेते हैं, इसलिए गमेश जी का एक नाम विघ्नहर्ता भी है लेकिन अगर आज के दिन आपके गणेश चतुर्थी की व्रत कथा नहीं पढ़ी तो आपकी पूजा और व्रत अधूरा माना जाएगा, ऐसे में जाने यहां गणेश जयंती विघ्नहर्ता की यह रहस्यमयी व्रत कहानी
गौरी गणेश चतुर्थी व्रत कथा (Ganesh Chaturthi Vrat Kahani)
मान्यताओं के अनुसार, गणेश चतुर्थी की यह व्रत कहानी गणेश के प्रकट होने से जुड़ी है. पुराणों के अनुसार, एक दिन माता पार्वती की दो सखियां जया और विजया ने देवी से कहा कि भगवान शिव के सभी गण रक्षक केवल उनकी आज्ञा मानते हैं, आपका (माता पार्वती) का कोई अपना खुदका रक्षक नहीं है. यह बात माता पार्वती के मन में बैठ गई. वहीं एक दिन भगवान शिव माता पार्वती से मिलने उनके पास पहुंचे, लेकिन उस दौरान माता पार्वती स्नान कर रही थीं. इसलिए नंदी ने शिव जी को रुकने के लिए कहा, लेकिन शिव जी नहीं माने वे भीतर चले गए. यह देखर माता को दुख हुआ. उन्होंने सोचा की सच में उनका कोई बात मानने वाला रक्षक नहीं है, अगर उनका अपना द्वारपाल होता तो ऐसा नहीं होता. इसके बाद माता पार्वती को एक ख्याल आया और उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक को बनाया और उसमें प्राण डाल दिए. माता पार्वती ने उबटन से उस बालक को अपना पुत्र मान लिया और स्नान जाने के समय, उसे द्वार की रक्षा का कार्य सौंपा. कुछ समय बाद भगवान शिव फिर वहां पहुंचे, लेकिन उबटन से उस बालक ने शिव जी को अंदर जाने से रोक दिया. शिव जी उस बालक को पहचानते थे. इसलिए शिव जी ने अपने गणों ने उसे हटाने का प्रयास कराया, लेकिन कोई भी सफल नहीं हो पाया. इसके बाद भगवान शिव को बेहद क्रोध आ गया और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया. जब माता पार्वतीको यह पता चला तो वह अत्यंत क्रोधित हो गईं. उनके क्रोध से पूरा संसार भय से कांपने. सभी देवताओं ने माता से क्षमा मांगी. तब शिव जी सभी देवताओं को आदेश दिया कि उत्तर दिशा में जो पहला जीव मिले, उसका सिर लाकर बालक के धड़ पर लगाया दें. देवताओं को एक हाथी मिला और उसका सिर बालक पर लगाया गया. शिव जी की कृपा से वो बालक जीवित हो उठा. इसके बाद सभी देवताओं ने उसे आशीर्वाद दिया और शिव जी ने उसे गणों का प्रमुख बनाया. तभी से वह गजानन गणेश कहलाए.
इसलिए आज गणेश चतुर्थी को गणेश के जन्मोत्सव के तौर पर मनाया जाता है और यह उनके विघ्नहर्ता स्वरूप की याद दिलाती है. आज गणेश चतुर्थी के दिन श्रद्धा से कथा का पाठ करने से जीवन में शांति, बुद्धि और शुभ आरंभ का आशीर्वाद मिलता है.
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