10
Kerala Assembly Election 2026: केरल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए चुनाव आयोग द्वारा मतदान के तारीखों की घोषणा के बाद राजनीति गलियारों में हलचल तेज हो चुकी है. केरल के 140 सीटों पर 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होगा और 4 मई को मतगणना होगी, जिसमें बहुमत के लिए 71 सीटों की जरूरत है. राजनीतिक रूप से जागरूक राज्यों में से एक केरल सिर्फ सत्ता परिवर्तन का मुकाबला नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों की बड़ी परीक्षा है.
राज्य में पारंपरिक रूप से मुकाबला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के बीच होता रहा है, लेकिन इस बार बीजेपी भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है. इस पूरे चुनावी समीकरण में जो सबसे अहम रोल निभाता हैं वह है माइनॉरिटी वोट जिसमें खासकर मुस्लिम और ईसाई समुदाय होता है. ऐसे में चलिए विस्तार से जानें कि अल्पसंख्यक वोट निर्णायक क्यों है और केरल में बीजेपी के लिए क्या चुनौती है.
केरल में क्यों अहम है अल्पसंख्यक वोट?
केरल में धार्मिक संतुलन बेहद खास माना जाता है, जिसमें मुस्लिम आबादी लगभग 26 से 27 प्रतिशत, ईसाई लगभग 18 प्रतिशत और हिंदू लगभग 54 प्रतिशत है. यानी कुल मिलाकर करीब 45 प्रतिशत वोटर माइनॉरिटी समुदाय से आते हैं, जो कई सीटों पर सीधे चुनावी परिणाम तय करते हैं. खासकार मलप्पुरमस कन्नूर, कोझिकोड जैसे क्षेत्रों में मुस्लिम वोट निर्णायक हैं.
हिंदू-मुस्लिम फैक्टर कैसे बनता है चुनावी समीकरण?
केरल में उत्तर भारत जैसा खुला ध्रुवीकरण कम देखने को मिलता है, लेकिन सॉफ्ट पॉलिटिक्स और पहचान की राजनीति यहां भी असर डालती है. इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) लंबे समय से UDF के साथ है और मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा इसी गठबंधन को जाता है. लेकिन, हाल के चुनावों में माइनॉरिटी वोट का कंसोलिडेशन UDF के पक्ष में झूकता दिखा है. वहीं LDF पर आरोप लगे कि वह सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर झूका, जिससे मुस्लिम वोटर नाराज हुआ. यानी माइनॉरिटी वोट का मूड बदलते ही पूरा चुनावी परिणाम बदल सकता है.
केरल में क्या है बीजेपी के लिए चुनौती?
केरल में लंबे समयत तक कमजोरी मानी जाने वाली बीजेपी अब राज्य की राजनीति में खुद को तीसरी बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. साल 2024 में पली बार लोकसभा सीट जीतने के बाद पार्टी का मनोबल काफी बढ़ा है और उसने अपने विस्तार की रणनीति को तेज कर दिया है. बीजेपी एक ओर जहां हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण पर काम कर रही है, वहीं दूसरी ओर वह ईसाई समुदाय तक अपनी पहुंच बढ़ाने की भी कोशिश में लगी है. इसके साथ ही पार्टी नए चेहरे और हाई-प्रोफाइल उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर अपी स्वीकार्यकता बढ़ाना चाहती है. इन सभी चीजों के अलावा बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह माइनॉरिटी वोट से अब भी बड़े पैमाने से दूर हैं.