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हर ड्राइवर के मन का सवाल, कौन सा पेट्रोल दे बेहतर माइलेज और परफॉर्मेंस? जानें नॉर्मल और पावर पेट्रोल में अंतर

Normal vs Power Petrol: पेट्रोल भरवाते वक्त हमारे दिमाग में अक्सर यह ख्याल आता है कि हमारी गाड़ी के लिए कौन सा पेट्रोल सही है, नॉर्मल या फिर पावर तो इस खबर में जान लें पूरा अंतर.

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Difference Between Normal and Power Petrol: अगर आप भी कार या बाइक चलाते हैं, तो फ्यूल भरवाते वक्त आपके सामने अक्सर दो विकल्प आते हैं नॉर्मल पेट्रोल और पावर पेट्रोल (प्रीमियम पेट्रोल). दोनों के नाम तो लगभग हर ड्राइवर ने सुने हैं, लेकिन यह सवाल अक्सर मन में उठता है कि आखिर इन दोनों में फर्क क्या है और कौन-सा फ्यूल हमारी गाड़ी के लिए बेहतर रहेगा. आइए इसे एक सरल तरीके से समझते हैं.

पेट्रोल के दो प्रकार

भारत में आमतौर पर पेट्रोल दो वैरिएंट में उपलब्ध होता है —

1. नॉर्मल पेट्रोल (Regular Petrol)

2. पावर या प्रीमियम पेट्रोल (Power/Premium Petrol)

दोनों ही आपकी गाड़ी के इंजन को चलाने का काम करते हैं, लेकिन इनके बीच का सबसे बड़ा अंतर होता है ऑक्टेन रेटिंग (Octane Rating) का.

 

क्या होती है ऑक्टेन रेटिंग?

ऑक्टेन रेटिंग उस क्षमता को दर्शाती है, जिसके जरिए कोई फ्यूल इंजन में “नॉकिंग” यानी असामान्य कंपन या आवाज़ को रोक सकता है.

कम ऑक्टेन रेटिंग: मतलब फ्यूल जल्दी जलता है, जो सामान्य गाड़ियों के लिए ठीक रहता है.

ज्यादा ऑक्टेन रेटिंग: मतलब फ्यूल धीरे-धीरे और नियंत्रित तरीके से जलता है, जो हाई-परफॉर्मेंस इंजनों के लिए बेहतर होता है.

 नॉर्मल पेट्रोल

  • नॉर्मल पेट्रोल को साधारण इंजन वाली कारों और मोटरसाइकिलों के लिए डिजाइन किया गया है.
  • इसकी ऑक्टेन रेटिंग कम होती है (आमतौर पर 87-89).
  • यह कीमत में सस्ता होता है और रोजमर्रा की ड्राइविंग के लिए पर्याप्त पावर देता है.
  • इसका रखरखाव खर्च भी कम होता है.
  • अगर आपकी गाड़ी कम्यूटर बाइक, मिड-रेंज कार या नॉन-टर्बो इंजन वाली है, तो नॉर्मल पेट्रोल आपके लिए पूरी तरह उपयुक्त है.

 

पावर पेट्रोल

  • पावर पेट्रोल, जिसे प्रीमियम पेट्रोल भी कहा जाता है, में ऑक्टेन रेटिंग अधिक होती है (आमतौर पर 91-93 या उससे ज्यादा).
  • यह हाई परफॉर्मेंस गाड़ियों, जैसे स्पोर्ट्स कार, लग्जरी SUV या टर्बोचार्ज्ड इंजन वाली गाड़ियों के लिए बनाया गया है.
  • इसमें कुछ एडिटिव्स मिलाए जाते हैं जो इंजन की सफाई में मदद करते हैं और परफॉर्मेंस को थोड़ा बेहतर बनाते हैं.
  • यह इंजन नॉकिंग को रोकता है, एक्सिलरेशन को स्मूथ बनाता है और गाड़ी की रेस्पॉन्सिवनेस बढ़ा सकता है.

हालांकि, अगर आपकी गाड़ी हाई-परफॉर्मेंस कैटेगरी में नहीं आती, तो इसका असर आपको खास महसूस नहीं होगा सिर्फ खर्च बढ़ेगा.

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