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RES-010 New Fat Burning Injection: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में गलत खानपान और खराब लाइफस्टाइल की वजह से मोटापा (obesity) एक बड़ी समस्या बन गया है. अगर आप भी इस परेशानी से जूझ रहे हैं तो आपके लिए एक राहत भरी खबर हैं जिससे आप अपना वजन आसानी से कम कर सकते है. जी हां, सही सुना आपने मोटापे से परेशान लोग जिम, डाइटिंग और महंगे ट्रीटमेंट का सहारा लेते हैं, लेकिन अब आप केवल एक इंजेक्शन से अपना वजन कम कर सकते है.
कैसे काम करता हैं ये इंजेक्शन
इस नए इंजेक्शन को वैज्ञानिकों ने RES-010 नामक एक फैट-बर्निंग इंजेक्शन (Fat Burning Injection) विकसित किया है, जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि यह मौजूदा वेट-लॉस इंजेक्शनों से बिल्कुल अलग तरीके से काम करता है. मौजूदा दवाइयां जैसे Wegovy और Mounjaro भूख दबाने पर आधारित हैं. इन्हें लेने पर व्यक्ति कम खाता है और वजन घटता है. लेकिन इनके कई दुष्प्रभाव सामने आए हैं जैसे मांसपेशियों का नुकसान, थकान और दवा बंद करने पर तेजी से फैट वापस आना. यही वजह है कि इनका असर स्थायी नहीं माना जाता.
वियना में आयोजित यूरोपियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज की मीटिंग में पेश की गई शुरुआती रिसर्च के अनुसार, RES-010 भूख को दबाता नहीं बल्कि शरीर के मेटाबॉलिज्म को रीप्रोग्राम करता है. यह इंजेक्शन miR-22 नामक RNA अणु को ब्लॉक करता है, जिसे मोटापे की प्रक्रियाओं का “मास्टर कंट्रोलर” कहा जाता है.
चूहों पर सफल प्रयोग
रिसर्च में जब इस दवा को चूहों पर आजमाया गया, तो दिलचस्प नतीजे सामने आए. जिन चूहों को RES-010 दिया गया, उन्होंने उतना ही खाना खाया जितना बाकी चूहों ने, लेकिन फिर भी उनका वजन घटा. खास बात यह रही कि दवा बंद करने के बाद भी उनका वजन दोबारा नहीं बढ़ा.
Resalis Therapeutics के CEO डॉ. रिक्कार्डो पनेला का कहना है कि यह दवा कोशिकाओं को इस तरह बदल देती है कि वे फैट और ऊर्जा का उपयोग अधिक कुशलता से करें. यह माइटोकॉन्ड्रिया की एक्टिविटी बढ़ाती है और शरीर के सफेद फैट (जो ऊर्जा स्टोर करता है) को ब्राउन फैट (जो ऊर्जा जलाता है) में बदलने में मदद करती है. यही वजह है कि वजन दोबारा बढ़ने की संभावना कम हो सकती है.
विशेषज्ञों की राय
हालांकि शुरुआती नतीजे उत्साहजनक हैं, लेकिन विशेषज्ञ अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ सरे के न्यूट्रिशन विशेषज्ञ डॉ. एडम कॉलिन्स का कहना है कि पूरे डेटा का इंतजार करना होगा. केवल शुरुआती स्टडी के आधार पर यह कहना मुश्किल है कि दवा इंसानों में कितना असर करेगी और लंबे समय तक कितनी सुरक्षित साबित होगी.