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Premanand Ji Maharaj: जब कोई अपना अचानक दूरी बना लेता है, तो मन सबसे पहले यही सोचता है-क्या वो दोबारा लौटेगा? यही सवाल बेचैनी पैदा करता है, रातों की नींद उड़ाता है और बार-बार फोन चेक करवाता है. रिश्तों की इस मानसिक उथल-पुथल में प्रेमानंद जी महाराज के विचार आज के दौर में बेहद प्रासंगिक लगते हैं.वे न तो भावनाओं को दबाने की सलाह देते हैं और न ही किसी को मनाने के लिए खुद को झुकाने की. उनका संदेश साफ है,खुद के भीतर संतुलन, आत्मसम्मान और स्थिरता पैदा कीजिए. जब इंसान अंदर से मजबूत हो जाता है, तो रिश्तों की दिशा अपने आप बदलने लगती है. कई बार सामने वाला तभी आपकी अहमियत समझता है, जब आपकी गैर-मौजूदगी उसे महसूस होती है.