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आखिर क्यों रात के अंधेरे में ही अंडे देती हैं मादा कछुए? चौंका देगा कुदरत का यह राज, 2 लाख कछुओं की परिंदों से बचाई जाएगी जान!

ओडिशा के रुषिकुल्या समुद्र तट पर इस साल 14 से 17 मार्च के बीच लगभग 2 लाख मादा ऑलिव रिडले कछुओं ने सामूहिक नेस्टिंग (Arribada) की है, ये मादा कछुए साल दर साल उसी तट पर लौटती हैं जहां उनका जन्म हुआ था, वन विभाग ने अंडों की सुरक्षा के लिए 'एसओपी' (SOP) के तहत पुख्ता इंतज़ाम किए हैं, क्योंकि अगले 45 से 60 दिनों में इन अंडों से नन्हे कछुए बाहर निकलकर समंदर की ओर दौड़ लगाएंग.


Rushikulya Beach Olive Ridley Nesting 2026: गंजाम का रुषिकुल्या तट इन दिनों एक जैविक विरासत (Ecological Heritage) का केंद्र बना हुआ है, ब्रह्मपुर वन प्रभाग के अनुसार ऑलिव रिडले कछुओं की यह जीवन यात्रा बेहद अनुशासित होती है, नेस्टिंग का समय इनका मिलन नवंबर से जनवरी के बीच गहरे समुद्र में होता, इसके बाद फरवरी से मार्च के दौरान अनुकूल मौसम (हवा की दिशा और तापमान) मिलते ही ये मादाएं तट पर आती हैं, प्रक्रिया एक मादा कछुआ रेत में अपने ‘फ्लिपर्स’ से करीब 1.5 से 2 फीट गहरा गड्ढा खोदती है, इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 45 से 60 मिनट का समय लगता है, जिसमें वह 100 से 150 अंडे देती है और फिर उन्हें रेत से ढंककर वापस समंदर में चली जाती है, रात का रहस्य है  ये मादाएं रात के अंधेरे को इसलिए चुनती हैं ताकि कौवे, बाज़ और कुत्तों जैसे शिकारियों से बच सकें, साथ ही दिन की तपती रेत अंडों के भ्रूण को नुकसान पहुंचा सकती है, जबकि रात की ठंडी रेत इनके विकास के लिए सर्वोत्तम होती है.

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Rushikulya Beach Olive Ridley Nesting 2026: गंजाम का रुषिकुल्या तट इन दिनों एक जैविक विरासत (Ecological Heritage) का केंद्र बना हुआ है, ब्रह्मपुर वन प्रभाग के अनुसार ऑलिव रिडले कछुओं की यह जीवन यात्रा बेहद अनुशासित होती है, नेस्टिंग का समय इनका मिलन नवंबर से जनवरी के बीच गहरे समुद्र में होता, इसके बाद फरवरी से मार्च के दौरान अनुकूल मौसम (हवा की दिशा और तापमान) मिलते ही ये मादाएं तट पर आती हैं, प्रक्रिया एक मादा कछुआ रेत में अपने ‘फ्लिपर्स’ से करीब 1.5 से 2 फीट गहरा गड्ढा खोदती है, इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 45 से 60 मिनट का समय लगता है, जिसमें वह 100 से 150 अंडे देती है और फिर उन्हें रेत से ढंककर वापस समंदर में चली जाती है, रात का रहस्य है  ये मादाएं रात के अंधेरे को इसलिए चुनती हैं ताकि कौवे, बाज़ और कुत्तों जैसे शिकारियों से बच सकें, साथ ही दिन की तपती रेत अंडों के भ्रूण को नुकसान पहुंचा सकती है, जबकि रात की ठंडी रेत इनके विकास के लिए सर्वोत्तम होती है.

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