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HomeVideosस्कूल की किताबों बढ़ते रेट से बन जाएंगी बोझ? एक बेबस पिता ने सुनाई आपबीती, दुकानदारों की ‘तानाशाही’ देख भड़के लोग!

स्कूल की किताबों बढ़ते रेट से बन जाएंगी बोझ? एक बेबस पिता ने सुनाई आपबीती, दुकानदारों की ‘तानाशाही’ देख भड़के लोग!

Written By: Aksha Choudhary
Last Updated: 2026-04-08 18:53:22

सोशल मीडिया पर एक पिता का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने स्कूलों और किताब विक्रेताओं के बीच के 'नेक्सस' गठजोड़ की पोल खोली है, उन्होंने बताया कि कैसे कक्षा 2 और 3 जैसी छोटी क्लास का कोर्स 9 से 10 हजार रुपये में बेचा जा रहा है दुकानदारों ने अपनी तानाशाही चला रखी है, जहां मोल-भाव की कोई गुंजाइश नहीं है और पुरानी कीमतों पर नए प्राइस लेबल चिपकाकर उन्हें मनमाने दामों पर बेचा जा रहा है.


School Books Price Scam Video: यह वीडियो निजी स्कूलों की मनमानी और शिक्षा की बढ़ती लागत पर एक गंभीर बहस छेड़ता है, एक सामान्य ज्ञान की पतली सी किताब की कीमत भी 500 रुपये तक रखी जा रही है, जो साधारण कागज पर छपी होती है पिता का सवाल जायज है ‘इसमें ऐसा क्या विशेष प्रिंट है?’ वीडियो में आरोप लगाया गया है कि दुकानदार पुरानी छपी हुई कीमतों को छिपाने के लिए उन पर नए स्टीकर लगा रहे हैं, जो सीधे तौर पर धोखाधड़ी है स्कूल अक्सर किसी एक खास दुकान का पता देते हैं, जहां से किताबें लेना अनिवार्य होता है यह प्रतिस्पर्धा को खत्म कर तानाशाही को जन्म देता है, पहले किताबें बड़े भाई-बहनों से मिल जाती थीं या कम दाम में सरकारी दुकानों पर उपलब्ध थीं, अब हर साल ‘एडिशन’ बदलने के नाम पर अभिभावकों को लूटने का रास्ता बना लिया गया है.

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Written By: Aksha Choudhary
Last Updated: 2026-04-08 18:53:22


School Books Price Scam Video: यह वीडियो निजी स्कूलों की मनमानी और शिक्षा की बढ़ती लागत पर एक गंभीर बहस छेड़ता है, एक सामान्य ज्ञान की पतली सी किताब की कीमत भी 500 रुपये तक रखी जा रही है, जो साधारण कागज पर छपी होती है पिता का सवाल जायज है ‘इसमें ऐसा क्या विशेष प्रिंट है?’ वीडियो में आरोप लगाया गया है कि दुकानदार पुरानी छपी हुई कीमतों को छिपाने के लिए उन पर नए स्टीकर लगा रहे हैं, जो सीधे तौर पर धोखाधड़ी है स्कूल अक्सर किसी एक खास दुकान का पता देते हैं, जहां से किताबें लेना अनिवार्य होता है यह प्रतिस्पर्धा को खत्म कर तानाशाही को जन्म देता है, पहले किताबें बड़े भाई-बहनों से मिल जाती थीं या कम दाम में सरकारी दुकानों पर उपलब्ध थीं, अब हर साल ‘एडिशन’ बदलने के नाम पर अभिभावकों को लूटने का रास्ता बना लिया गया है.

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