AI Ka Powr: कई सालों तक नियमित सैलरी को खासकर कॉर्पोरेट करियर में सुरक्षित भविष्य की पहचान माना गया, लेकिन निवेशक सौरभ मुखर्जी के मुताबिक अब यह भरोसा टूट रहा है. सैलरी वाली नौकरी अब लंबे समय की स्थिरता और आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं रही.
AI Ka Power: सालों से एक रेगुलर सैलरी सफलता और सुरक्षा का प्रतीक रहा है, खासकर उन स्टूडेंट्स के लिए जो टेक्नोलॉजी, फाइनेंस या प्रोफेशनल सर्विसेज़ में कॉर्पोरेट करियर बनाना चाहते थे. महीने की सैलरी सिर्फ इनकम नहीं थी. यह स्थिरता, स्टेटस और आगे बढ़ने का वादा था. लेकिन इन्वेस्टर और मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के फाउंडर सौरभ मुखर्जी (Saurabh Mukherjee) के अनुसार वह वादा धीरे-धीरे खत्म हो रहा है. वह दौर खत्म हो रहा है जब सैलरी वाली नौकरी लंबे समय तक फाइनेंशियल आराम की गारंटी देती थी.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन अब भविष्य की बातें नहीं हैं, वे पहले से ही वर्कप्लेस को बदल रहे हैं. जो काम कभी एंट्री-लेवल प्रोफेशनल्स की बड़ी टीमों द्वारा किए जाते थे, अब एल्गोरिदम, सॉफ्टवेयर और इंटेलिजेंट सिस्टम द्वारा किए जाते हैं. कोडिंग सपोर्ट, डेटा प्रोसेसिंग, कस्टमर सर्विस, फाइनेंशियल एनालिसिस और यहां तक कि लीगल रिसर्च भी तेजी से ऑटोमेटेड हो रहे हैं. मुखर्जी का तर्क है कि यह बदलाव स्ट्रक्चरल है, न कि अस्थाई. जैसे-जैसे कंपनियां एफिशिएंसी बढ़ाने और लागत कम करने के लिए AI अपना रही हैं, रूटीन व्हाइट-कॉलर नौकरियों की मांग लगातार कम हो रही है. सैलरी जिन्हें कभी भरोसेमंद सहारा माना जाता था, अपनी लंबी अवधि की ताकत खो रहे हैं.
इस नई सच्चाई में जॉब टाइटल और बड़े ब्रांड वाले एम्प्लॉयर से कहीं ज़्यादा यह मायने रखता है कि कोई व्यक्ति असल में क्या कर सकता है. टीओआई की एक रिपोर्ट के अनुसार मुखर्जी का मानना है कि भविष्य उन लोगों का है जिनके पास “AI-प्रूफ” स्किल्स हैं. ऐसी क्षमताएं जिन्हें मशीनें कॉपी नहीं कर सकतीं. इनमें क्रिएटिविटी, क्रिटिकल थिंकिंग, जटिल प्रॉब्लम-सॉल्विंग, इमोशनल इंटेलिजेंस, नेगोशिएशन और लीडरशिप शामिल हैं. हालांकि टेक्निकल नॉलेज महत्वपूर्ण बनी हुई है, लेकिन इसे अडैप्टेबिलिटी और जिज्ञासा के साथ जोड़ा जाना चाहिए. सिर्फ कोई टूल या भाषा सीखना काफी नहीं है; स्टूडेंट्स को टेक्नोलॉजी में बदलाव के साथ खुद को बदलने के लिए तैयार रहना चाहिए.
अकेली पारंपरिक शिक्षा अब स्टूडेंट्स को तेजी से बदलते जॉब मार्केट के लिए तैयार नहीं कर सकती. इंटर्नशिप, फ्रीलांस काम, साइड प्रोजेक्ट और क्रॉस-डिसिप्लिनरी लर्निंग के माध्यम से वास्तविक दुनिया का अनुभव आवश्यक होता जा रहा है. एक मजबूत पोर्टफोलियो जो प्रैक्टिकल प्रभाव दिखाता है, अक्सर एक अच्छी रिज्यूमे से ज़्यादा मायने रखता है. मुखर्जी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि स्टूडेंट्स को सिर्फ नौकरी ढूंढने वालों की तरह नहीं, बल्कि बिल्डर्स और क्रिएटर्स की तरह सोचना चाहिए. नौकरी में रहते हुए भी एंटरप्रेन्योरियल सोच व्यक्तियों को कहीं ज़्यादा मूल्यवान और लचीला बना सकती है.
सबसे बड़ा माइंडसेट बदलाव जो स्टूडेंट्स को करना चाहिए, वह है “जॉब सिक्योरिटी” से “स्किल सिक्योरिटी” की ओर बढ़ना. करियर अब सीधी लाइन में नहीं चलेंगे, और ज़िंदगी भर एक ही नौकरी मिलना अब बहुत कम होता जा रहा है. जो लोग लगातार सीखते रहेंगे, पुरानी बातें भूलेंगे और नई बातें सीखेंगे, वे आर्थिक उतार-चढ़ाव के बावजूद काम के बने रहेंगे.
अब सैलरी ही सफलता या सुरक्षा का आखिरी पैमाना नहीं है. AI से चलने वाली दुनिया में यह स्किल्स होंगी ,खासकर इंसान-केंद्रित, बदलने वाली स्किल्स – जो तय करेंगी कि कौन आगे बढ़ेगा और कौन संघर्ष करेगा. जो छात्र अपने भविष्य की योजना बना रहे हैं, उनके लिए असली इन्वेस्टमेंट सैलरी के पीछे भागने में नहीं, बल्कि ऐसी काबिलियत बनाने में है जिसे टेक्नोलॉजी रिप्लेस नहीं कर सकती है.
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