MPPSC Story: मजबूत इरादे और परिवार का साथ हो तो मुश्किल हालात भी राह नहीं रोक पाते. ऐसी ही कहानी मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के छोटे से कस्बे रावटी में पले-बढ़े सिद्धार्थ मेहता (Siddharth Mehta) की है. साधारण परिवार में जन्मे सिद्धार्थ का बचपन आर्थिक चुनौतियों के बीच बीता. उनके पिता की छोटी-सी किराना दुकान ही घर की आजीविका का मुख्य सहारा थी. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने सपने देखना नहीं छोड़ा.
संघर्षों से भरे इस माहौल ने उनके भीतर मेहनत, जिम्मेदारी और आत्मविश्वास की मजबूत नींव रखी. उनके पिता की छोटी किराना दुकान ही घर की आय का मुख्य साधन थी. स्कूल से लौटने के बाद वे दुकान पर बैठते, सामान तौलते, ग्राहकों से व्यवहार करना सीखते और रोज़ का हिसाब-किताब संभालते थे. इसी माहौल ने उनमें जिम्मेदारी, अनुशासन और मेहनत का संस्कार डाला. छोटे कस्बे से बड़े सपने देखने वाले सिद्धार्थ आज युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं.
साधारण पृष्ठभूमि, असाधारण सपना
जहां अधिकांश लोग परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं, वहीं सिद्धार्थ ने बड़ा सोचने का फैसला किया. उन्होंने राज्य प्रशासनिक सेवा में जाने और डिप्टी कलेक्टर बनने का सपना देखा. यह सपना आसान नहीं था. सीमित आर्थिक संसाधन, छोटे शहर का माहौल और प्रतिस्पर्धी परीक्षा का दबाव हर कदम पर चुनौतियां थीं. लेकिन सिद्धार्थ ने अपने लक्ष्य से नज़र नहीं हटाई.
सात बार असफलता, फिर भी अडिग हौसला
मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग) की परीक्षा पास करना लाखों अभ्यर्थियों का सपना होता है. सिद्धार्थ ने भी यही राह चुनी, लेकिन सफलता तुरंत नहीं मिली. उन्होंने लगातार सात बार परीक्षा दी. कई बार प्रारंभिक परीक्षा में रुकावट आई, तो कभी मेन्स में उम्मीदें टूटीं. असफलताओं ने उन्हें निराश जरूर किया, पर तोड़ा नहीं. एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने तैयारी छोड़कर पिता की दुकान संभालने का मन बना लिया. उन्हें लगा कि शायद यह सपना उनके लिए नहीं बना. लेकिन परिवार का अटूट विश्वास उनके लिए संबल बना. माता-पिता और अपनों के समर्थन ने उन्हें फिर से खड़ा किया.
2023 में 17वीं रैंक: मेहनत का प्रतिफल
आखिरकार वर्ष 2023 उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. सिद्धार्थ ने पूरे प्रदेश में 17वीं रैंक हासिल की. मेंस परीक्षा में 684 अंक और इंटरव्यू में 141 अंक प्राप्त कर उन्होंने असिस्टेंट कलेक्टर पद पर चयन सुनिश्चित किया. यह सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि वर्षों की तपस्या का परिणाम था.
युवाओं के लिए सीख
सिद्धार्थ मेहता की सफलता यह साबित करती है कि हालात चाहे जैसे हों, यदि संकल्प मजबूत हो और परिवार का साथ मिले, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं. किराना दुकान की छोटी-सी कुर्सी से कलेक्ट्रेट की बड़ी मेज तक का सफर हौसले, धैर्य और निरंतर प्रयास से तय किया जा सकता है. उनकी कहानी हर उस युवा को संदेश देती है असफलता अंत नहीं, बल्कि सफलता की तैयारी है.