Chaitra Navratri 2026 Day 4: चैत्र नवरात्रि इस बार 9 दिनों की है. शक्ति की साधना का 22 मार्च को चौथा दिन है. आज भगवती दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा होती है. इस दिन देवी के साधक जप, व्रत आदि नियमों का पालन करते हुए मां कूष्मांडा की विधि-विधान से पूजा करते हैं. धार्मिक मान्यता है कि, मां कूष्मांडा का अर्थ कुम्हड़े से भी है. मां कूष्मांडा को कुम्हड़ा अति प्रिय है, इसलिए भी इनको कूष्मांडा कहते हैं. हालांकि बृहद रूप में देखा जाए, तो एक कुम्हड़े में अनेक बीज होते हैं. हर बीज में एक पौधे को जन्म देने की क्षमता होती है. उसके अंदर सृजन की शक्ति होती है. मां ने इस पूरे ब्रह्मांड की रचना की है. उनके अंदर भी सृजन की शक्ति है. मां कूष्मांडा की नवरात्रि के चौथे दिन पूजा करने से व्यक्ति को दिव्य वस्तुओं की प्राप्ति हो सकती है. अब सवाल है कि आखिर, चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन माता कूष्मांडा की पूजा कैसे करें? कूष्मांडा की पूजा में क्या-क्या सामग्री चाहिए? मां कूष्मांडा की पूजा में किन मंत्रों का जप करना चाहिए? नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा को क्या भोग लगाएं? मां कूष्मांडा की कथा क्या है? इस बारे में India News को बता रहे हैं उन्नाव के ज्योतिषाचार्य ऋषिकांत मिश्र शास्त्री-
मां कूष्मांडा का स्वरूप कैसा है?
ज्योतिषाचार्य के मुताबिक, मां भगवती के कूष्मांडा स्वरूप ने अपनी मंद मुस्कुराहट से ही सृष्टि की रचना की थी, इसलिए देवी कूष्मांडा को सृष्टि की आदि स्वरूपा और आदि शक्ति माना गया है. देवी कूष्मांडा को समर्पित इस दिन का संबंध हरे रंग से जाना जाता है. मातारानी की 8 भुजाएं हैं, जिसमें से 7 में उन्होंने कमंडल, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत का कलश, चक्र और गदा ली हुई है. माता के 8वें हाथ में जप माला है और मां शेर पर सवार हैं.
मां कूष्मांडा की पूजा के लिए सामग्री
- कलावा
- कुमकुम
- अक्षत
- घी
- धूप
- चंदन
- अक्षत
- तिल
- पीली वस्तुओं से बनी मिठाई
- पीले वस्त्र और पीले रंग की चूड़ियां
मां कूष्मांडा की पूजा करने की विधि
नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा के लिए सबसे पहले स्नान करें और साफ पीले वस्त्र धारण करें. इस दिन भी सर्वप्रथम कलश की पूजा करनी चाहिए. पूजा की विधि शुरू करने से पूर्व हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम करें. फिर सच्चे मन से देवी का ध्यान करते हुए मंत्र का जाप करते हुए देवी को पंचामृत से स्नान करवाएं. शुद्ध घी का दीपक जलाएं. इसके बाद लाल फूल, कुमकुम और पीले चंदन का तिलक लगाएं. फिर फल और मिठाई का भोग लगाएं. साथ ही, गणेश जी और देवी कूष्मांडा की आरती कर पूजा में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थना करें. अंत में शंखनाद करते हुए पूजा समाप्त करें और प्रसाद को घर के सभी सदस्यों में बांटें.
मां कूष्मांडा की पूजा के मंत्र
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नमः॥
सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
मां कूष्मांडा का प्रिय भोग
नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा में पीले रंग का केसर वाला पेठा रखना चाहिए और देवी को उसी का भोग लगाएं. कुछ लोग मां कूष्मांडा की पूजा में समूचे सफेद पेठे के फल की बलि भी चढ़ाते हैं. इसके साथ ही देवी को मालपुआ और बताशे भी चढ़ाने चाहिए. ऐसा करने से जीवन में सुख-समृद्धि और शांति आती है.
मां कूष्मांडा की पूजा का महत्व
हिंदू मान्यता के अनुसार, मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं. इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है. मां कूष्मांडा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं. यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है.
मां कूष्मांडा की व्रत कथा kushmanda Mata Vrat Katha
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब त्रिदेव ने सृष्टि की रचना करने की कल्पना की, तो उस समय ब्रह्मांड में अंधेरा छाया हुआ था. संपूर्ण ब्रह्मांड में सन्नाटा पसरा हुआ था. ऐसे में त्रिदेव ने मां दुर्गा से सहायता ली. फिर मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा ने ब्रह्मांड की रचना की. मां कूष्मांडा के मुख मंडल पर मुस्कान से पूरा ब्रह्मांड में उजाला हो गया. इसी वजह से मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा कहा गया. सनातन शास्त्रों के अनुसार, सूर्य लोक में मां कूष्मांडा वास करती हैं. मां कूष्मांडा मुखमंडल पर सूर्य प्रकाशवान है.