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जब अपनी सुंदरता पर द्रौपदी को हो गया था अभिमान, तब युधिष्ठिर ने कहे थे ऐसे शब्द जिन्हे सुनते ही हो गया था सुंदरता का…?

Facts About Mahabharat: अपनी सुंदरता पर घमंड करने पर युधिष्ठिर ने दी थी द्रौपदी को ऐसी सीख

BY: Prachi Jain • UPDATED :
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India News (इंडिया न्यूज), Facts About Mahabharat: महाभारत की कथा में धर्मराज युधिष्ठिर को उनके धर्म और सत्य के प्रति समर्पण के लिए जाना जाता है। जब पांडव भाई और द्रौपदी महाप्रस्थान पर निकले, तो स्वर्ग के मार्ग में धर्मराज ने जीवन और धर्म से जुड़ी कई महत्वपूर्ण शिक्षाएं दीं। इनमें से एक शिक्षा शारीरिक सुंदरता और उस पर घमंड से जुड़ी थी, जो आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।

नकुल और द्रौपदी का पतन: घमंड का परिणाम

स्वर्ग के मार्ग में चलते हुए सबसे पहले नकुल गिरे। धर्मराज युधिष्ठिर ने बताया कि नकुल के पतन का कारण उनकी अपनी सुंदरता पर अत्यधिक घमंड था। नकुल को यह विश्वास था कि उनकी सुंदरता अद्वितीय है, और यही अहंकार उनके पतन का कारण बना।

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Facts About Mahabharat: अपनी सुंदरता पर घमंड करने पर युधिष्ठिर ने दी थी द्रौपदी को ऐसी सीख

द्रौपदी के गिरने पर भी धर्मराज ने कहा कि द्रौपदी को अपनी सुंदरता और गुणों पर अभिमान था। उन्होंने इसे अज्ञानता का प्रतीक बताया। द्रौपदी के रूप और गुण ईश्वर द्वारा प्रदत्त थे, लेकिन उन्होंने इसे अपना व्यक्तिगत योगदान मान लिया था।

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युधिष्ठिर की शिक्षा: अहंकार का त्याग

धर्मराज युधिष्ठिर ने स्पष्ट रूप से कहा कि शारीरिक सुंदरता और रूप-रंग पर घमंड करना अज्ञानता है। उनका तर्क था कि:

  1. शारीरिक सुंदरता क्षणभंगुर है: शरीर नश्वर है और सुंदरता भी समय के साथ समाप्त हो जाती है।
  2. सुंदरता पर व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं: यह ईश्वर की देन है, जिसमें किसी व्यक्ति का कोई योगदान नहीं होता।
  3. अहंकार का आधार नहीं: चाहे वह धन हो, बुद्धि हो, ज्ञान हो या रूप, किसी भी चीज पर अहंकार नहीं करना चाहिए क्योंकि यह सत्य से दूर जाने का मार्ग है।

सत्कर्मों का महत्व

युधिष्ठिर ने पांडव भाइयों को शिक्षा दी कि व्यक्ति को रूप-सौंदर्य के बजाय अपने सत्कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है:

  • धर्म का पालन करना: सत्य और न्याय के मार्ग पर चलना।
  • अहंकार का त्याग: जीवन में विनम्रता और आत्मनिरीक्षण को अपनाना।
  • सत्कर्मों की प्राथमिकता: अपने कार्यों से दूसरों के जीवन को सुधारना और समाज में सकारात्मक योगदान देना।

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आज के समय में प्रासंगिकता

आज भी धर्मराज युधिष्ठिर की यह शिक्षा उतनी ही सार्थक है। आधुनिक युग में, जब बाहरी सुंदरता को अत्यधिक महत्व दिया जाता है, यह समझना जरूरी है कि सच्ची सुंदरता व्यक्ति के आचरण और विचारों में होती है। बाहरी सुंदरता अस्थायी है, लेकिन अच्छे कर्म और एक सकारात्मक दृष्टिकोण जीवन भर कायम रहते हैं।

धर्मराज युधिष्ठिर की यह शिक्षा हमें सिखाती है कि अहंकार किसी भी प्रकार का हो, वह विनाश का कारण बनता है। शारीरिक सुंदरता पर घमंड करना न केवल अज्ञानता है, बल्कि यह हमें हमारे वास्तविक उद्देश्य, अर्थात् सत्कर्मों और धर्म के पालन, से दूर ले जाता है। इसलिए, हमें अपने जीवन में विनम्रता और धर्म का मार्ग अपनाते हुए सत्य और कर्म की ओर अग्रसर होना चाहिए।

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डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है।पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। इंडिया न्यूज इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है।

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