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कभी भोलेनाथ से दुआओं में मांगा था जिस बेटे को, आज उसी के साथ पिता ने उठाई कांवड़, काशी में करेंगे जलाभिषेक

Sawan Kanwar Yatra: मध्य प्रदेश के सोनू ने भगवान शिव से दो बेटों की मन्नत मांगी थी. मनोकामना पूरी होने के बाद सावन में वह प्रयागराज के दशाश्वमेध घाट से गंगाजल लेकर काशी में जलाभिषेक के लिए कांवड़ यात्रा पर निकले हैं. खास बात यह है कि सोनू अपने 5 साल के बेटे को भी साथ लेकर चल रहे हैं. करीब 50 किलो गंगाजल वाली कांवड़ उठाए सोनू का कहना है कि वह अपने बेटे को बचपन से ही धार्मिक परंपराओं और संस्कारों से जोड़ना चाहते हैं.

Sawan Kanwar Yatra: कहानी एक ऐसी मन्नत से शुरू होती है, जो आज एक भावुक कांवड़ यात्रा की वजह बन गई है. मध्य प्रदेश के रहने वाले सोनू ने भगवान शिव से इच्छा मांगी थी कि उनके घर दो बेटों की किलकारी गूंजे. समय बीता और उनकी यह मनोकामना पूरी हुई. उनके दो बेटे हुए. बड़ा बेटा अब 5 साल का है, जबकि छोटा बेटा 3 साल का है. बच्चों के जन्म के बाद भगवान शिव के प्रति सोनू की आस्था और भी गहरी हो गई. सावन का पवित्र महीना आया तो सोनू ने अपनी आस्था को एक संकल्प से जोड़ दिया. उन्होंने कांवड़ उठाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने का फैसला किया, लेकिन इस बार उनकी यात्रा अकेले की नहीं थी. सोनू अपने 5 साल के बेटे को भी साथ लेकर कांवड़ यात्रा पर निकल पड़े. उनके लिए यह सिर्फ गंगाजल लेकर काशी पहुंचने की यात्रा नहीं, बल्कि अपने बेटे को बचपन से ही अपनी धार्मिक परंपराओं और संस्कारों से जोड़ने की कोशिश भी है.

प्रयागराज के दशाश्वमेध घाट से भरा गंगाजल

सोनू अपनी कांवड़ यात्रा के लिए प्रयागराज के दशाश्वमेध घाट पहुंचे. यहां से उन्होंने गंगाजल लिया और अब काशी की ओर रवाना हो चुके हैं. उनकी कांवड़ में छह स्टील की गागर हैं, जिनमें गंगाजल भरा हुआ है. बताया गया है कि उनकी कांवड़ का वजन करीब 50 किलो है. सोनू के साथ उनका एक साथी भी कांवड़ यात्रा पर है. उसकी कांवड़ में करीब 30 किलो गंगाजल है. इस तरह दोनों की कांवड़ में मिलाकर लगभग 80 किलो गंगाजल है. इतना वजन लेकर लंबा रास्ता तय करना आसान नहीं है, लेकिन आस्था के आगे मुश्किलें भी छोटी नजर आ रही हैं.

पिता का हाथ पकड़े काशी की ओर चल पड़ा 5 साल का बेटा

इस यात्रा की सबसे खास तस्वीर सोनू और उनके 5 साल के बेटे की है. एक तरफ पिता के कंधे पर भारी कांवड़ है तो दूसरी तरफ छोटा बच्चा अपने पिता के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है. रास्ता लंबा है और सफर आसान नहीं, लेकिन बच्चे का उत्साह अपने पिता का हौसला बढ़ा रहा है. सोनू का कहना है कि वह चाहते हैं कि उनका बेटा बचपन से ही जाने कि कांवड़ क्या होती है, गंगाजल का क्या महत्व है और इस परंपरा के पीछे की आस्था क्या है. वह चाहते हैं कि उनका बेटा इन परंपराओं को केवल किताबों या दूसरों की बातों से न जाने, बल्कि उन्हें अपने जीवन में देखकर और महसूस करके समझे.

आज मैं बेटे का हाथ पकड़कर चल रहा हूं, कल वह परंपरा आगे बढ़ाएगा’

सोनू के लिए अपने बेटे को कांवड़ यात्रा में साथ लेकर चलना महज धार्मिक यात्रा नहीं है. वह इसे अपनी अगली पीढ़ी को संस्कार देने का माध्यम मानते हैं. आज वह बेटे का हाथ पकड़कर उसे काशी की ओर ले जा रहे हैं, लेकिन उनकी इच्छा है कि आने वाले समय में उनका बेटा खुद इन परंपराओं को समझे और आगे बढ़ाए. एक पिता के लिए इससे भावुक पल और क्या हो सकता है कि जिस बेटे के लिए कभी उन्होंने भगवान शिव से मन्नत मांगी थी, आज उसी बेटे का हाथ थामकर वह महादेव के दरबार की ओर जा रहे हैं.

मन्नत पूरी होने की खुशी में कंधे पर गंगाजल

करीब पांच साल पहले सोनू ने भगवान शिव से दो बेटों की इच्छा मांगी थी. आज उनके परिवार में दो बेटे हैं. बड़ा बेटा पांच साल का हो चुका है और छोटा तीन साल का है. मनोकामना पूरी होने के बाद सोनू ने अपनी आस्था को एक यात्रा के जरिए व्यक्त करने का फैसला किया. आज उनके कंधे पर सिर्फ गंगाजल से भरी कांवड़ नहीं है. उस कांवड़ के साथ उनकी मन्नत, आस्था और भगवान शिव के प्रति विश्वास भी जुड़ा हुआ है. शायद उनका 5 साल का बेटा अभी इस पूरी कहानी को समझने के लिए बहुत छोटा है, लेकिन आने वाले समय में जब वह बड़ा होगा, तो उसके पास अपने बचपन की इस यात्रा की एक खास कहानी होगी.वह शायद तब यह जान पाएगा कि जब वह पांच साल का था, तब उसके पिता उसे अपने साथ कांवड़ यात्रा पर लेकर काशी गए थे और उसके जन्म से पहले उसके लिए भगवान शिव से एक मन्नत मांगी थी.

प्रयागराज के घाटों पर बच्चों के साथ दिख रहे कई कांवड़िए

सोनू और उनका बेटा इस यात्रा में अकेले नहीं हैं. सावन के दौरान प्रयागराज के घाटों पर ऐसे कई परिवार नजर आ रहे हैं, जो अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर कांवड़ यात्रा पर निकले हैं. कहीं पिता अपने बेटे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ रहे हैं, तो कहीं बच्चे भी परिवार के साथ यात्रा का हिस्सा बन रहे हैं. कुछ परिवारों के लिए यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि बच्चों को अपनी परंपराओं और संस्कारों से जोड़ने का अवसर भी है. उनका मानना है कि परंपराएं केवल सुनाने से नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारकर और अगली पीढ़ी को साथ लेकर चलने से आगे बढ़ती हैं.

बच्चों को परंपरा समझाने का सोनू का अपना तरीका

सोनू चाहते हैं कि उनके बच्चे अपनी परंपराओं को केवल सुनें नहीं, बल्कि उन्हें करीब से देखें और समझें. इसी वजह से उन्होंने अपने 5 साल के बेटे को इतनी कम उम्र में अपने साथ कांवड़ यात्रा पर ले जाने का फैसला किया. उनके लिए यह सफर पिता और बेटे के बीच रिश्ते को मजबूत करने के साथ-साथ धार्मिक संस्कारों को आगे बढ़ाने का भी जरिया है. रास्ते में बच्चे को कांवड़, गंगाजल और भगवान शिव की आराधना के बारे में जो कुछ देखने और सीखने को मिलेगा, वह शायद उसके बचपन की यादों का हिस्सा बन जाएगा.

कंधे पर 50 किलो की कांवड़, दिल में मन्नत और साथ बेटे का हाथ

प्रयागराज से काशी तक का रास्ता सोनू के लिए आसान नहीं है. कंधे पर करीब 50 किलो गंगाजल से भरी कांवड़ है. सफर लंबा है और रास्ते में थकान भी होगी. इसके बावजूद सोनू लगातार आगे बढ़ रहे हैं.उनके साथ उनका 5 साल का बेटा है और यही उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है. जिस भगवान शिव से उन्होंने कभी दो बेटों की मन्नत मांगी थी, आज उन्हीं महादेव के दरबार में वह अपने एक बेटे का हाथ पकड़कर पहुंचने जा रहे हैं. सोनू की कांवड़ में सिर्फ गंगाजल नहीं है. उसमें एक पिता की आस्था, वर्षों पुरानी मन्नत की याद और अपनी अगली पीढ़ी को परंपरा से जोड़ने की भावना भी शामिल है. प्रयागराज से काशी तक की यह यात्रा उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक सफर नहीं, बल्कि पिता से बेटे तक आस्था और संस्कार पहुंचाने की कहानी बन गई है.
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