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क्या सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट हिंदू विवाह को साबित करने के लिए काफी है? सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा- ‘ये कॉन्ट्रैक्ट नहीं…

हिंदू विवाह कानून: क्या हिंदू शादी को साबित करने के लिए मैरिज सर्टिफिकेट काफी है? क्या यह जरूरी रीति-रिवाजों के बिना पति-पत्नी का कानूनी दर्जा दे सकता है? जानें इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया था?

Legal Hindu Marriage: सुप्रीम कोर्ट ने साल 2024 के अपने एक फैसले में यह साफ किया है कि कानूनी तौर पर हिंदू विवाह क्या होता है? मात्र शादी का सर्टिफिकेट अपने आप में पति-पत्नी का दर्ज नहीं दे सकता, जब तक कि जरूरी हिंदू विवाह की रस्में असल में पूरी न की जाएं। कोर्ट ने घोषणा की कि किसी भी रीति-रिवाज या पारंपरिक रस्मों के बिना, शादी का रजिस्ट्रेशन कानूनी तौर पर बेकार होगा. यह फैसला जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने डॉली रानी बनाम मनीष कुमार चंचल मामले में सुनाया, जहां कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल किया और घोषणा की कि शादी का सर्टिफिकेट होने के बावजूद दोनों पक्षों की कानूनी तौर पर शादी कभी नहीं हुई थी.

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के मुताबिक, याचिकाकर्ता महिला और आरोपी पुरुष, दोनों प्रशिक्षित कमर्शियल पायलट थे, उनकी सगाई 07.03.2021 को हुई थी. उन्होंने अपने शब्दों में दावा किया कि पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार तुरंत शादी करने के बजाय, उन्होंने 07.07.2021 को वैदिक जनकल्याण समिति (रजिस्टर्ड) नाम के एक प्राइवेट संगठन से शादी का सर्टिफिकेट लिया और बाद में, उस सर्टिफिकेट के आधार पर, नियमों के अनुसार उत्तर प्रदेश में शादी के रजिस्ट्रेशन का सर्टिफिकेट प्राप्त किया. हालांकि, दोनों परिवारों ने असल हिंदू शादी की रस्म बहुत बाद में, 25.10.2022 को तय की थी. उस रस्म के होने से पहले, दोनों पक्षों के बीच गंभीर मतभेद पैदा हो गए. याचिकाकर्ता महिला ने आरोपी पुरुष और उसके परिवार के सदस्यों पर दहेज मांगने का आरोप लगाया और 17.11.2022 को उनके खिलाफ IPC की धारा 498A, 420, 506, 509 के साथ-साथ दहेज निषेध अधिनियम के तहत FIR दर्ज कराई.

बाद में, मार्च 2023 में, प्रतिवादी पुरुष ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत मुजफ्फरपुर, बिहार में फैमिली कोर्ट में तलाक के लिए याचिका दायर की. इससे दुखी होकर, याचिकाकर्ता महिला ने माननीय सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और तलाक के मामले को रांची ट्रांसफर करने की मांग की, जहां वह अपने माता-पिता के साथ रहती थी. हालांकि, ट्रांसफर याचिका पेंडिंग रहने के दौरान, दोनों पक्षों ने अपने रुख पर फिर से विचार किया और संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिलकर एक एप्लीकेशन दायर की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट से यह घोषणा करने का अनुरोध किया गया कि कोई वैध शादी कभी नहीं हुई और सभी संबंधित आपराधिक और वैवाहिक कार्यवाही को रद्द कर दिया जाए.

कोर्ट के सामने दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि कानून की नजर में कभी कोई वैध हिंदू विवाह नहीं हुआ था और इसलिए तलाक की याचिका खुद ही कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं थी. आरोपी के वकील ने भी स्वीकार किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत कोई भी रस्में नहीं की गईं, लेकिन तर्क दिया कि उन्हें तलाक की याचिका दायर करने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि एक विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र मौजूद था. दोनों पक्षों ने सामूहिक रूप से कोर्ट के सामने यह बात रखी कि उन्होंने कभी कोई हिंदू रीति-रिवाज, परंपराएं और रस्में नहीं निभाईं. उन्होंने कोर्ट के सामने कबूल किया कि उन्हें बाहरी दबाव और व्यावहारिक कारणों से सर्टिफिकेट मिले थे और अब वे ऐसी शादी का कानूनी बोझ नहीं ढोना चाहते थे जो असल में कभी हुई ही नहीं थी.

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

राहत देने से पहले, कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 और 8 की विस्तार से जांच की. ऐसा करते हुए, इसने हिंदू विवाह की प्रकृति और अनिवार्यताओं पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं. कोर्ट ने बताया कि धारा 7 में 'समारोह' शब्द शामिल है जिसका स्वाभाविक रूप से मतलब रस्में करना है. इसने स्पष्ट किया कि जब तक शादी उचित रस्मों और सही तरीके से नहीं की जाती, तब तक उसे 'समारोह' नहीं कहा जा सकता.

बेंच ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह एक कॉन्ट्रैक्ट नहीं है, बल्कि एक संस्कार है और सप्तपदी जैसी रस्में पवित्र अग्नि की उपस्थिति में सात फेरे इसके पूरा होने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार किसी विवाह के समारोह के अभाव में, एक पुरुष और एक महिला एक-दूसरे के पति और पत्नी का दर्जा हासिल नहीं कर सकते. इसने आगे कहा कि किसी भी संस्था द्वारा जारी किया गया प्रमाण पत्र, रस्मों के सबूत के बिना, हिंदू कानून के तहत वैवाहिक स्थिति स्थापित नहीं कर सकता. एक्ट की धारा 8 में रजिस्ट्रेशन के मुद्दे पर, जो रजिस्ट्रेशन को रेगुलेट करता है, कोर्ट ने यह साफ किया कि रजिस्ट्रेशन शादी नहीं करता, बल्कि सिर्फ एक वैध शादी का सबूत देने में मदद करता है.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसले में क्या कहा गया?

अगर धारा 7 के अनुसार कोई शादी नहीं हुई है, तो रजिस्ट्रेशन शादी को वैधता नहीं देगा. इसलिए रजिस्ट्रेशन सबूत के तौर पर है, लेकिन शादी का आधार नहीं है, जिस सेरेमनी के आधार पर रजिस्ट्रेशन होता है, अगर वह नहीं हुई है, तो रजिस्ट्रेशन बिल्कुल भी प्रभावी नहीं होगा. बेंच ने आगे एक बढ़ते ट्रेंड पर चिंता जताई, जिसमें युवा जोड़े बिना असल सेरेमनी के वीजा एप्लीकेशन या सुविधा जैसे प्रैक्टिकल कारणों से शादी के सर्टिफिकेट ले रहे थे.

कोर्ट ने इस तरह की प्रथा पर दुख जताया कि हाल के सालों में, हमने ऐसे कई मामले देखे हैं जहां 'प्रैक्टिकल कारणों' से, एक पुरुष और एक महिला भविष्य में अपनी शादी करने के इरादे से एक्ट की धारा 8 के तहत अपनी शादी रजिस्टर करवाना चाहते हैं, ऐसे डॉक्यूमेंट के आधार पर जो 'उनकी शादी होने' के सबूत के तौर पर जारी किया गया हो, जैसा कि इस मामले में है. जैसा कि हमने पहले ही कहा है, मैरिज रजिस्ट्रार के सामने शादी का ऐसा कोई भी रजिस्ट्रेशन और उसके बाद जारी किया गया सर्टिफिकेट यह पुष्टि नहीं करेगा कि पार्टियों ने हिंदू रीति-रिवाज से शादी की है. हम देखते हैं कि युवा जोड़ों के माता-पिता विदेश में जाने के लिए वीजा अप्लाई करने के लिए शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए सहमत हो जाते हैं, जहां दोनों में से कोई एक 'समय बचाने के लिए' काम कर रहा हो और शादी की सेरेमनी को औपचारिक रूप देने का इंतजार कर रहा हो. ऐसी प्रथाओं की निंदा की जानी चाहिए. अगर भविष्य में ऐसी कोई शादी नहीं होती है तो इसका क्या नतीजा होगा? तब पार्टियों का स्टेटस क्या होगा? क्या वे कानूनन पति-पत्नी होंगे और क्या उन्हें समाज में ऐसा स्टेटस मिलेगा? उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए, कोर्ट ने एक प्रासंगिक सवाल भी पूछा अगर बाद में भी ऐसी शादी नहीं हो पाती है तो इसका क्या नतीजा होगा?

उस समय पार्टियों का स्टेटस क्या होगा?

इन सवालों का जवाब देते हुए, कोर्ट ने हिंदू कानून में शादी के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व पर बात की, जिसमें कहा गया कि शादी कोई कमर्शियल मामला या सिर्फ एक उत्सव नहीं है, बल्कि एक पवित्र संस्था है जिस पर परिवार और समाज टिका हुआ है. हिंदू विवाह एक संस्कार और पवित्र बंधन है जिसे भारतीय समाज में एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्था का दर्जा दिया जाना चाहिए. इसलिए, हम युवा पुरुषों और महिलाओं से आग्रह करते हैं कि वे शादी करने से पहले ही इस संस्था के बारे में गहराई से सोचें और यह समझें कि भारतीय समाज में यह संस्था कितनी पवित्र है.

शादी 'नाच-गाने' और 'खाने-पीने' का कार्यक्रम नहीं है, न ही यह अनुचित दबाव डालकर दहेज और तोहफे मांगने और देने का मौका है, जिससे बाद में आपराधिक कार्यवाही शुरू हो सकती है. शादी कोई व्यावसायिक लेन-देन नहीं है. यह एक गंभीर और मूलभूत घटना है जिसे एक पुरुष और एक महिला के बीच संबंध स्थापित करने के लिए मनाया जाता है, जो भविष्य में एक विकसित होते परिवार के लिए पति और पत्नी का दर्जा हासिल करते हैं, जो भारतीय समाज की एक बुनियादी इकाई है. कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि जबकि स्पेशल मैरिज एक्ट किसी भी धर्म के जोड़ों को रजिस्ट्रेशन और औपचारिक प्रक्रिया के माध्यम से कानूनी रूप से शादी करने की अनुमति देता है, हिंदू मैरिज एक्ट में वैधानिक शर्तों को पूरा करने के अलावा विशेष रूप से समारोहों की आवश्यकता होती है. इस प्रकार, जो स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत पर्याप्त हो सकता है, वह स्वचालित रूप से हिंदू मैरिज एक्ट के तहत लागू नहीं होगा.

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 शादीशुदा जोड़े की ज़िंदगी में इस घटना के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पहलुओं को गंभीरता से मानता है. शादीशुदा जोड़े का दर्जा देने और व्यक्तिगत अधिकारों और संपत्ति के अधिकारों को पहचानने के लिए शादियों के रजिस्ट्रेशन के लिए एक सिस्टम देने के अलावा, इस अधिनियम में रीति-रिवाजों और समारोहों को एक खास जगह दी गई है. इसका मतलब है कि हिंदू विवाह को पूरा करने के लिए जरूरी शर्तों का लगन से, सख्ती से और धार्मिक रूप से पालन किया जाना चाहिए. ऐसा इसलिए है क्योंकि एक पवित्र प्रक्रिया की शुरुआत कोई मामूली बात नहीं हो सकती. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 के तहत पारंपरिक रीति-रिवाजों और समारोहों में ईमानदारी से आचरण और भागीदारी सभी शादीशुदा जोड़ों और समारोह की अध्यक्षता करने वाले पुजारियों द्वारा सुनिश्चित की जानी चाहिए.

FAQ

1. क्या सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट से हिंदू शादी साबित हो जाती है?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि सिर्फ रजिस्ट्रेश सर्टिफिकेट अपने आप में पति-पत्नी का कानूनी दर्जा नहीं देता. जब तक हिंदू विवाह अधिनियम 1955, धारा 7 के अनुसार आवश्यक धर्मिक रश्मे जैसे सप्तपदी न हो.
2. हिंदू विवाह में आवश्यक रस्में क्या-क्या होती है?
हिंदू विवाह में परंपरा के मुताबिक होने वाले धार्मिक समारोह में अग्नि के सामने विवाह, मंत्रोच्चार, कन्यादान, सप्तपदी यानी सात फेरे शामिल होते है.
3. क्या रजिस्ट्रेशन शादी कराता है?
बिल्कूल नहीं. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, रजिस्ट्रेशन केवल पहले से हुई वैध शादी का सबूत होता है. वह शादी नहीं कराता.
4. अगर रस्में नहीं हुईं लेकिन सर्टिफिकेट बन गया तो, ऐसे केस में क्या होता है?
ऐसे केस में भी कानून की नजर में शादी नहीं हुई है ये माना जाएगा और इसमें पति-पत्नी का दर्जा नहीं मिलता और तलाक का केस भी मान्या नहीं माना जाता है.
Shristi S

Shristi S has been working in India News as Content Writer since August 2025, She's Working ITV Network Since 1 year first as internship and after completing intership Shristi Joined Inkhabar Haryana of ITV Group on November 2024.

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