Sant Premanand Maharaj: भारत में सबसे ज्यादा चर्चित साधु-संतों में प्रेमानंद महाराज का नाम आता है. उनकी लोकप्रियता विदेशों तक फैली हुई है. महाराज की दिव्य विभूति, जिन्होंने अपनी मधुर वाणी और भक्तिमय जीवन से लाखों लोगों को प्रेरित किया है. उनके प्रवचन काफी प्रेरणादायक होते हैं. यही वजह है कि, महाराज के प्रवचन सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं, जिनमें वो तमाम तरह के सवालों का जवाब देते हैं. इसी क्रम में संत प्रेमानंद जी से एक भक्त ने पूछा कि, आजकल शादियां सफल क्यों नहीं हो रही हैं? चाहें लव मैरिज हो या अरेंज… आए दिन शादी टूटने की खबरें सामने आ रहे हैं. हाल के दिनों में कई ऐसे चौंकाने वाले मामले सामने भी आ चुके हैं. जानिए आखिर इस सवाल पर वृंदावन से रसिक संत प्रेमानंद महाराज जी ने क्या जवाब दिया-
‘बच्चों का चरित्र पवित्र नहीं रहा’
संत प्रेमानंद महाराज जी सवाल के जबाव में कहते हैं कि, रिश्ते कैसे चलेंगे, आजकल बच्चों के चरित्र पवित्र नहीं हैं. मान लो अगर चार होटल के भोजन खाने की जुबान में आदत पड़ गई है तो घर की रसोई का भोजन अच्छा नहीं लगेगा. जब चार पुरुषों से मिलने की आदत पड़ गई है तो एक पति को स्वीकार करने की हिम्मत उसमें नहीं रह जाएगी. ऐसे ही जब चार लड़कियों से व्यभिचार करता है तो वह अपनी पत्नी से संतुष्ट नहीं रह पाएगा, उसे चार से व्यभिचार करना पड़ेगा क्योंकि उसने आदत बना ली है.
‘पवित्रता के लिए जान दी, पर शरीर छूने नहीं दिया’
इस गंभीर मुद्दे पर संत प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि 100 में कोई 2-4 कन्याएं ऐसी होंगी जो अपना पवित्र जीवन रखकर किसी पुरुष को समर्पित होती होंगी. कैसे वह लड़की सच्ची बहू बनेगी जो चार लड़कों से मिल चुकी है, जो चार लड़कियों से मिल चुका हो, क्या वह सच्चा पति बन पाएगा? जब मुगलों का आक्रमण हुआ तो पवित्रता के लिए जान दे दी लेकिन शरीर को छूने नहीं दिया. आज वही बच्चे ये सब क्या है? इस कथन का मतलब है कि, अगर कोई व्यक्ति विवाह से पूर्व ही कई लोगों से संबंध बना लेता है, तो उसे स्थिरता और एक रिश्ते की गहराई समझ में नहीं आती है.
लिव-इन रिलेशनशिप गंदगी का खजाना
लिव-इन रिलेशनशिप को भारतीय समाज की संस्कृति और मर्यादा के खिलाफ बताया. उनका मानना है कि यह पाश्चात्य विचारधारा रिश्तों को स्वच्छ नहीं बल्कि भोगवादी दृष्टिकोण से देखती है. लिव-इन रिलेशनशिप गंदगी का खजाना है. ना विचार शुद्ध होते हैं ना व्यवहार और ना शरीर. प्रेमानंद महाराज, जब विचार ही अपवित्र हों, तो जीवनसाथी से समर्पण और सम्मान की अपेक्षा नहीं की जा सकती. आज की शिक्षा और लाइफस्टाइल में धार्मिक मूल्यों की भूमिका कम होती जा रही है. शादी अब सामाजिक इवेंट बनती जा रही है, जबकि उसका मूल उद्देश्य है – एक साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति. यदि विवाह धर्म के अनुसार नहीं किया गया, तो जीवनसाथी का चयन भी सही नहीं होगा और वैवाहिक जीवन में सुख की कल्पना भी नहीं की जा सकती.
लव और अरेंज मैरिज नहीं, सोंच का फर्क है
प्रेमानंद महाराज का स्पष्ट मत है कि समस्या लव या अरेंज मैरिज के स्वरूप में नहीं, बल्कि उस चरित्र और सोच में है जिसके आधार पर निर्णय लिए जाते हैं. यदि व्यक्ति की सोच संस्कारों, धर्म और संयम पर आधारित हो, तो कोई भी विवाह सफल हो सकता है.