Magh Mela 2026: प्रयागराज के माघ मेले में डिफेंडर और पोर्शे कार को लेकर चर्चा में रहे सतुआ बाबा का नया वीडियो वायरल हो रहा है. उन्होंने माघ मेले में गुरुवार को बुलडोजर की सवारी का लुत्फ उठाया.
Magh Mela 2026
Magh Mela 2026: प्रयागराज के माघ मेले में डिफेंडर और पोर्शे कार को लेकर चर्चा में रहे सतुआ बाबा का नया वीडियो वायरल हो रहा है. उन्होंने माघ मेले में गुरुवार को बुलडोजर की सवारी का लुत्फ उठाया. वे कभी ट्रैक्टर, ऊंट, डिफेंडर तो कभी पोर्शे जैसी महंगी गाड़ियों में देखे गए. माघ मेला को लेकर श्रध्दालुओं ने प्रयागराज के संगम पर पहुंचकर मकर संक्रांति स्नान की डुबकी लगाई. इस आस्था की डुबकी में ट्रेंडिंग में चल रहे सतुआ बाबा ने भी स्नान किया. साथ ही सुमेरुपीठाधीश्वर शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने समर्थकों के साथ गंगा स्नान किया. सतुआ बाबा ने इस दौरान लोगों को एकजुटता का संदेश भी दिया.
सतुआ बाबा अब अपने एक नए अवतार में देखे गए. वे संगम पर बुलडोजर में आए. यहां पहुंचकर उन्होंने श्रद्धालुओं के साथ उनके हाल चाल जाना. फिर आस्थावान लोगों से बातचीत की. सतुआ बाबा का साधारण व्यवहार श्रद्धालुओं को पसंद आया. बाबा ने मकर संक्रांति की मौके पर उपस्थित सभी लोगों को शुभकामनाएं दी. सतुआ बाब ने श्रद्धालुओं से कहा कि एक रहोगे तो ही नेक रहोगे. यह समाज और देश की मजबूती के लिए बेहद जरुरी है. उनकी यह मौजूदगी लोगों के बीच काफी चर्चा का विषय बनी हुई है.
माघ मेले में काफी मात्रा में लोग स्नान करने पहुंचे. सुमेरुपीठाधीश्वर शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती भी अपने समर्थकों के साथ गंगा स्नान करने गए. उन्होंने स्नान कर देश की सुख शांति की कामना की. सरस्वती जी ने कहा कि मां गंगा में स्नान करने से अदृश्य शक्तियां प्राप्त होती हैं. शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि माघ मेले और मकर संक्राति का धार्मिक महत्व है. इस मौके पर पर गंगा स्नान करने से मन को शांति प्राप्ति होती है. ठंड होने के बाद भी लाखों लोगों ने मकर संक्रांति के पर्व पर गंगा में आस्था की डुबकी लगाई. संगम पर कई संतों औऱ महात्माओं की मौजूदगी ने धार्मिक गरिमा को और भी बढ़ा दिया. इस दौरान सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किए गए.
साल 2012 में छठे पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन यमुनाचार्य जी महाराज सतुआ बाबा का निधन हो गया था. इसके बाद संतोष दास जी को जिम्मेदारी दी गई. संतोष दास जी विष्णु स्वामी संप्रदाय के 57 वें आचार्य बने. दरअसल, संतोष दास ने 11 वर्ष की उम्र में ही परिवार को छोड़ दिया था और आध्यात्म के रास्ते चल पड़े. इनको काशी विश्वनाथ का प्रतिनिधि भी माना जाता है. महाकुंभ 2025 में उन्हें जगतगुरु की पदवी दी गई थी.
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