Makar Sankranti: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिस व्यक्ति मृत्यु मकर संक्रांति के दिन हो तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है, यह वजह है कि इच्छा मृत्यु का वरदान होने के बाद भी भीष्म पितामह 58 दिन तक बाणों की शैय्या पर लेटे रहे और मकर संक्रांति के दिन ही अपने प्राण त्यागे
Why Did Bhishma Choose Makar Sankranti to Die
Makar Sankranti: आज मकर संक्रांति का त्योहार तिल और गुड़ की मिठास के साथ पूरे देश भर में बेहद धूमधाम से मनाया जा रहा हैं. यह साल का सबसे बड़ा पहला त्योहार होता है. इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, इसलिए इसे मकर संक्रांति कहा जाता है और यह उत्तरायण की शुरुआत माना जाता है. यानी इस दिन से सूर्य उत्तर दिशा की यात्रा शुरू करते हैं. वैदिक ज्योतिष दृष्टि के अनुसार यह समय अत्यंत शुभ और सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है.
मकर संक्रांति सिर्फ एक त्योहार नहीं है, इसके अध्यात्मिक दृष्टि से भी इसके कई पहलू हैं. शास्त्रों में मकर संक्रांति को देवताओं का काल माना गया है. इससे जुड़ी एक धार्मिक कथा यह भी है, इच्छा मृत्यु का वरदान होने के बाद भी भीष्म पितामह 58 दिन तक बाणों की शैय्या पर लेटे रहे और मकर संक्रांति के दिन ही अपने प्राण त्यागे थे. लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों किया? भीष्म पितामाह ने सूर्य के उत्तरायण होने तक इतना कष्ट क्यों सहा और अपने प्राणों को क्यों रोक कर रखा और सूर्य उत्तरायण होने के बाद ही उन्होंने अपने प्राण क्यों त्याग दिए। आइये जानते हैंं पौराणिक कथा के अनुसार इसके पीछे का गहरा रहस्य.
भीष्म पितामह, महाभारत के सबसे मुख्य पात्रों में से एक थे. उन्हें भगवान कृष्ण का परम भक्त माना जाता था। भीष्म पितामाह शांतुन के औरस पुत्र थे और उनकी माता मां गंगा देवी है। भीष्म पितामाह एक महान योध्या, दृढ़ प्रतिज्ञा लेने वाले और बहुत ज्ञानी थे पिता शांतनु ने भीष्म पितामाह से प्रसन्न होकर उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया था. इस वरदान के जरिए वो अपनी मृत्यु पर अपनी इच्छा के अनुसार प्राण त्याग सकते थे. फिर भी वो महाभारत के युद्ध के दौरान 58 दिन तक बाणों की शैय्या पर रहे लेटे रहे और उन्होंने प्राण त्यागने के लिए मकर संक्रांति का दिन चुना.
शास्त्रों में मकर संक्रांति को देवताओं का काल माना जाता है. कहा जाता है कि जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं, तो स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं. कई धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर किसी की मृत्यु मकर संक्रांति के दिन होती है, तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. वो व्यक्ति जन्म-पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है और उसकी आत्मा ईश्वर में विलीन हो जाती है। मकर संक्रांति पर मरने वाले व्यक्ति की आत्मा बड़ी पुण्य मानी जाती हैं और ऐसी आत्माओं को स्वत: मोक्ष की प्राप्ति होती है. मकर संक्रांति को भगवान के दिन माना जाता हैं, इसलिए मान्यता के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन मरने वाले की आत्मा सीधे भगवान के चरणों में जगह पाती है.
यह बात आप महाभारत के भीष्म पितामाह की काहनी से बेहतर समझ सकते हैं, महाभारत युद्ध के 10वें दिन भीष्म पितामाह ने शिखंडी के सामने बाण नहीं चलाया था, जिसके बाद वो शिखंडी के बाणों के जाल में फंस गए और अर्जुन के बाणों ने बुरी तरह से भेद दिया जिसके बाद वो बुरी तरह घायल हो गए औक बाणों की शैय्या पर गिर पड़े. बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामाह ने असहनीय पीड़ा सही, लेकिन फिर भी उन्होंने तुरंत अपने प्राण नहीं त्यागे. क्योंकि उस समय सूर्य देव दक्षिणायन में थे और भीष्म पितामाह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे. क्योंकि श्री कृष्ण ने गीता में लिखा गया है कि उत्तरायण में जो व्यक्ति प्राण त्यागता हैं, उसे मोक्ष की प्राप्त होती हैं और यह बात भीष्ण पितामह को पता थी, क्योंकि वो श्री कृष्ण के बड़े भक्त थे. इसी वजह से भीष्म पितामाह ने बाण की शैय्या पर अपने रोक कर रखे हुए थे और सूर्य के उत्तरायण होते ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए और अंत में मोक्ष की प्राप्त की
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