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राजदरबारों में राखी का क्या था मतलब? भाई-बहन की कहानी जानकर चौंक जाएंगे, जानें मुगल काल में कैसे मनाया जाता था रक्षाबंधन

Rakshabandhan history: रक्षाबंधन आज भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा के वादे से जुड़ा त्योहार है, लेकिन इतिहास में राखी का स्वरूप इससे कहीं व्यापक रहा है. मध्यकालीन भारत में राखी सामाजिक, धार्मिक और भरोसे के रिश्ते मजबूत करने का माध्यम भी बनती थी. पुरोहितों द्वारा राखी बांधने से लेकर अलग समुदायों के लोगों के बीच राखी के रिश्ते तक, इस परंपरा के कई ऐतिहासिक रूप देखने को मिलते हैं.

Rakshabandhan history: सावन का महीना चल रहा है और इसके साथ ही रक्षाबंधन का इंतजार भी बढ़ गया है. आज यह त्योहार भाई-बहन के प्यार, स्नेह और उस वादे के लिए जाना जाता है, जिसमें भाई अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लेता है. लेकिन क्या आपको पता है कि राखी की परंपरा हमेशा सिर्फ सगे भाई की कलाई तक सीमित नहीं रही? इतिहास के अलग-अलग दौर में राखी का इस्तेमाल सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने, सम्मान जताने और सुरक्षा का भरोसा देने के लिए भी किया जाता था. खासकर मध्यकालीन भारत से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ बताते हैं कि राजपरिवारों से लेकर आम सामाजिक समूहों तक राखी बांधने की परंपरा के अलग-अलग रूप देखने को मिलते थे.

मुगल काल में भी  मनाया जाता था पर्व

गांधी राष्ट्रीयइंदिरा कला केंद्र से उपलब्ध शोध सामग्री के मुताबिक, मुगल काल में रक्षाबंधन श्रावण की पूर्णिमा के दिन मनाए जाने का उल्लेख मिलता है. उस समय राखी बनाने के लिए सूत और लिनन जैसे धागों का इस्तेमाल किया जाता था. वहीं, संपन्न परिवारों और राजघरानों में रेशमी धागों से बनी राखियां भी इस्तेमाल की जाती थीं. उस दौर में बहन अपने भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधती थी. इसके साथ ही धार्मिक और सामाजिक जीवन में भी राखी का महत्व दिखाई देता था. यानी राखी की परंपरा सिर्फ परिवार के भीतर का उत्सव नहीं थी, बल्कि इसके सामाजिक मायने भी थे.

जब पुरोहित भी बांधते थे राखी

इतिहास से जुड़ी जानकारी का एक दिलचस्प पहलू यह है कि उस समय राखी बांधने का काम सिर्फ बहनों तक सीमित नहीं था. पुरोहित और राजपुरोहित भी अपने यजमानों या संबंधित लोगों की दाहिनी कलाई पर राखी बांधते थे. इस परंपरा से पता चलता है कि राखी को धार्मिक संबंधों को मजबूत करने वाले प्रतीक के रूप में भी देखा जाता था. राखी बांधने के साथ एक-दूसरे के प्रति विश्वास और जिम्मेदारी का भाव जुड़ा हो सकता था. यानी उस समय कलाई पर बंधा धागा सिर्फ एक पारिवारिक रिश्ते का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक संबंधों को दर्शाने वाला माध्यम भी था.

राजदरबारों में क्यों खास थी राखी?

राजस्थान के सामाजिक इतिहास का अध्ययन करने वाले ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स टॉड ने भी राखी से जुड़े ऐसे संबंधों का उल्लेख किया है. उनकी पुस्तक एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान में राजस्थान की परंपराओं और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े कई विवरण मिलते हैं. ऐतिहासिक संदर्भों में राखी का इस्तेमाल कई बार भरोसेमंद रिश्ता कायम करने के लिए किया जाता था. राजदरबारों और सामंती समाज में ऐसे संबंधों का विशेष महत्व हो सकता था, क्योंकि राखी के जरिए सुरक्षा और सहयोग की जिम्मेदारी का भाव जुड़ जाता था. इसलिए उस समय राखी सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी. कई संदर्भों में यह सामाजिक संबंध और भरोसे की एक मजबूत डोर के रूप में भी सामने आती है.

राखी का मतलब सिर्फ भाई की रक्षा करना नहीं था

आज रक्षाबंधन का सबसे लोकप्रिय अर्थ भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा है. बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वादा करता है. लेकिन इतिहास यह बताता है कि राखी का अर्थ कभी-कभी इससे कहीं बड़ा हुआ करता था. यह धागा सुरक्षा, सम्मान, भरोसे और सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का प्रतीक भी बन सकता था. किसी महिला और पुरुष के बीच रक्त संबंध न होने के बावजूद राखी के माध्यम से एक ऐसा रिश्ता बनाया जा सकता था, जिसमें मुश्किल समय में साथ देने की जिम्मेदारी शामिल होती थी. यानी राखी की असली ताकत उसके धागे में नहीं, बल्कि उससे जुड़े भरोसे में थी.

हर राजघराने में नहीं था एक जैसा तरीका

रक्षाबंधन के ऐतिहासिक स्वरूप को लेकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि सभी राजा-महाराजा या राजघराने इस त्योहार को बिल्कुल एक ही तरह से मनाते थे. भारत के अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में परंपराओं का स्वरूप अलग रहा है. कहीं राखी का धार्मिक महत्व प्रमुख था, तो कहीं सामाजिक संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया जाता था. इसी विविधता ने रक्षाबंधन की परंपरा को अलग-अलग समय और समाज में अलग-अलग रूप दिए. इसलिए राखी के इतिहास को किसी एक घटना या एक कहानी तक सीमित करने के बजाय इसे भारतीय समाज की व्यापक परंपराओं के संदर्भ में देखना अधिक उचित है.

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