India News (इंडिया न्यूज), Mahakumbh 2025: वर्ष 2025 में प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन होने जा रहा है। धार्मिक कथाओं के अनुसार एक बार समुद्र मंथन के दौरान अमृत निकला था। इस अमृत के लिए देवताओं और दानवों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। इस दौरान अमृत कलश के लिए हुई छीना-झपटी में यह धरती पर चार स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन पर गिरा था। इसीलिए इन स्थानों पर महाकुंभ, कुंभ और अर्धकुंभ के आयोजन की परंपरा शुरू हुई। महाकुंभ और कुंभ के आयोजन को लेकर कई पौराणिक कथाएं बताई जाती हैं। इसके आयोजन की एक कथा श्री हरि भगवान विष्णु, समुद्र देव और देवी लक्ष्मी से जुड़ी है।
एक दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी क्षीरसागर में बैठे हुए थे। तभी समुद्र देव के पुत्र शंख वहां पहुंचे। शंख के पास समुद्र में रहने वाले जीवों से कर वसूलने की जिम्मेदारी थी। शंख को यह जिम्मेदारी उनके पिता समुद्र देव ने दी थी। शंख सभी से कर वसूलता था। पाताल और नागलोक भी समुद्र की तलहटी में थे। इसलिए वह नियमित रूप से कर चुकाता था, लेकिन एक बार शंख राक्षसों के षड्यंत्र में फंस गया और भगवान विष्णु से कर वसूलने चला गया।
Mahakumbh 2025: आखिर क्या रही वजह जो समुद्र देव ने भगवान विष्णु को दे दिया था ऐसा श्राप
हुआ यूं कि राक्षसों ने भगवान विष्णु से कर वसूलने की बात शंख के कान भर दिए। राक्षसों ने कहा कि शंख सभी से कर वसूलता है, लेकिन भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी से नहीं। राक्षसों ने शंख से कहा कि उनका मानना है कि वे दोनों समुद्र में नहीं रहते, बल्कि वे तुम्हारे पिता समुद्र देव के राज्य के ठीक ऊपर रहते हैं।
शंख राक्षसों के जाल में फंसकर क्षीरसागर पहुंच गया और भगवान विष्णु से कर मांगने लगा। उसने भगवान को अपशब्द कहे। उसने भगवान से कहा कि आपने मेरा कर दबा दिया है। यह सुनकर भगवान ने कहा कि नहीं शंख मैंने तुम्हारा कोई कर नहीं चुराया है। भगवान ने कहा कि शंख को पहले अपने पिता से नियमों की जानकारी लेनी चाहिए, लेकिन राक्षसों ने अपनी बातों से शंख को गुमराह कर दिया था। उसने श्री हरि की बात नहीं मानी।
शंख ने भगवान से कहा कि एक तो आप चोरी करते हैं और ऊपर से घमंड भी करते हैं। अब आप मुझे नियम समझाएंगे। यह कहते हुए शंख ने देवी लक्ष्मी की ओर देखा और कहा कि उसने इतनी सुंदर स्त्री को अपने पास बैठा रखा है और वह कर नहीं देना चाहता। उसने भगवान से कहा कि आप कर के बदले यह स्त्री उसे दे दें। यह सुनकर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी दोनों क्रोधित हो गए। भगवान विष्णु ने शंख पर कौमुदी गदा से प्रहार किया और वह मर गया।
जैसे ही समुद्र देव को शंख की मृत्यु की खबर मिली, वे अपना आपा खो बैठे। इसके बाद वे तुरंत क्षीरसागर पहुंचे और भगवान विष्णु की बात सुने बिना ही उन्हें श्राप दे दिया। उन्होंने भगवान को श्राप दिया कि श्री हरि ने देवी लक्ष्मी के कारण ही उनके पुत्र का वध किया है। इसलिए देवी लक्ष्मी उनसे अलग होकर समुद्र में विलीन हो जाएंगी। इसके बाद देवी लक्ष्मी समुद्र में विलीन हो गईं। वहीं भगवान ने समुद्र देव से कई बार देवी लक्ष्मी को लौटाने का अनुरोध किया, लेकिन समुद्र देव ने श्री हरि की बात नहीं मानी।
जब समुद्र देव ने भगवान की बात नहीं मानी, तब भोलेनाथ के आदेश पर श्री हरि ने देवताओं और दानवों के साथ मिलकर समुद्र मंथन किया। मंथन के दौरान समुद्र देव ने अपने कई अमूल्य रत्न खो दिए। अंत में उन्होंने हार मानकर देवी लक्ष्मी और अमृत कलश को भेज दिया। तब भगवान श्री हरि ने देवी लक्ष्मी से एक बार फिर विवाह किया।
समुद्र देव द्वारा भेजे गए कलश में अमृत था और उसी के कारण देवताओं और दानवों के बीच युद्ध छिड़ गया। उस कलश से अमृत की बूंदें प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में धरती पर गिरीं। ये चार स्थान हैं जहां महाकुंभ, कुंभ और अर्ध कुंभ का आयोजन होता है।
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