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Sabarimala Case: धर्म की व्याख्या अदालतों का काम नहीं…, सबरीमाला पर केंद्र का तीखा जवाब

Sabarimala Case: केंद्र ने अपनी दलीलों में कहा कि यदि अदालतें धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा तर्कसंगतता या आधुनिकता जैसे मानकों पर करेंगी, तो वे अपने दार्शनिक विचारों को धर्म पर थोप रही होंगी, जो संविधान के अनुरूप नहीं है. सरकार ने जोर देकर कहा कि कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत है या नहीं, यह तय करना संवैधानिक समीक्षा का हिस्सा नहीं हो सकता.

Written By: Divyanshi Singh
Last Updated: 2026-04-07 12:44:14

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Sabarimala Case: केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने वाले 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर रिव्यू पिटीशन का पुरजोर समर्थन किया है. आज की सुनवाई से पहले सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में डिटेल में लिखित दलीलें पेश कीं जिसमें कहा गया कि यह मुद्दा सिर्फ जेंडर इक्वालिटी के बारे में नहीं है बल्कि यह धार्मिक आस्था, परंपरा और सांप्रदायिक स्वायत्तता से गहराई से जुड़ा हुआ है. केंद्र सरकार ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के जरिए दायर एक हलफनामे में साफ किया कि धार्मिक प्रथाओं को तर्कसंगतता, आधुनिकता या वैज्ञानिकता के आधार पर आंकना न्यायिक दखलअंदाजी होगी. सरकार का रुख अब पूरी तरह साफ है.

‘धर्म की व्याख्या अदालतों का काम नहीं’

केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि अगर कोर्ट तर्कसंगतता या आधुनिकता जैसे क्राइटेरिया के आधार पर धार्मिक प्रथाओं का रिव्यू करते हैं, तो वे धर्म पर अपने फिलोसोफिकल विचार थोप रहे होंगे जो संविधान के खिलाफ है. सरकार ने जोर देकर कहा कि यह तय करना कि कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत है या नहीं संवैधानिक रिव्यू का हिस्सा नहीं हो सकता. जज न तो धार्मिक ग्रंथों का मतलब निकालने या धार्मिक सवालों पर फैसला करने के लिए ट्रेंड हैं और न ही संस्थागत रूप से सक्षम हैं. ज़

केंद्र सरकार ने “ज़रूरी धार्मिक रीति-रिवाज” के सिद्धांत पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि किसी रीति-रिवाज की ज़रूरत तय करने का अधिकार कोर्ट के बजाय संबंधित धार्मिक पंथ के पास होना चाहिए. सरकार ने तर्क दिया कि कोर्ट को तभी दखल देना चाहिए जब कोई रीति-रिवाज पब्लिक ऑर्डर, हेल्थ, नैतिकता या बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करता हो.

‘भेदभाव नहीं बल्कि धार्मिक परंपरा का हिस्सा’

केंद्र सरकार ने कहा कि सबरीमाला में भगवान अयप्पा की पूजा “नैष्ठिक ब्रह्मचारी” के रूप में की जाती है. महिलाओं खासकर प्रजनन उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर रोक इसी धार्मिक रूप से जुड़ी है. सरकार ने साफ किया कि यह भेदभाव नहीं है, बल्कि धार्मिक परंपरा का हिस्सा है और देवता के गुणों और रूप की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती. देवता की कानूनी पहचान को मान्यता दी गई है और इसलिए देवता की व्याख्या को आखिरी माना जाना चाहिए.

2018 के फैसले और संवैधानिक नैतिकता पर सवाल

केंद्र सरकार ने 2018 के पांच जजों की बेंच के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य की जांच की गई जिससे कोर्ट धार्मिक झगड़ों का धार्मिक आर्बिटर बन गया. सरकार ने संवैधानिक नैतिकता के कॉन्सेप्ट को भी अस्पष्ट और ज्यूडिशियरी द्वारा बनाया गया बताया. केंद्र का तर्क है कि संविधान में इसका कोई साफ आधार नहीं है और यह कोर्ट को धार्मिक परंपराओं को बदलने की इजाजत देता है, जो ज्यूडिशियल इंटरप्रिटेशन के जरिए संवैधानिक संशोधन के बराबर है.

जोसेफ शाइन फैसले पर आपत्तियां

केंद्र ने जोसेफ शाइन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) फैसले पर भी सवाल उठाए हैं, जिसने एडल्टरी को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था. सरकार ने कोर्ट से इस फैसले को कानून की नजर में गलत घोषित करने की अपील की है क्योंकि यह संवैधानिक नैतिकता की बहुत ज्यादा और अपनी-अपनी सोच पर आधारित इंटरप्रिटेशन पर भी निर्भर करता है.

केंद्र ने चेतावनी दी कि संवैधानिक फैसले संविधान पहले के फैसलों और स्थापित कानूनी सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए. जजों के भाषण, लेख या निजी विचार बाहरी और बदलते विचार होते हैं, जिन्हें अदालती फैसलों का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए. आर्टिकल 129 और 141 का हवाला देते हुए सरकार ने तर्क दिया कि अदालती फैसले संस्थागत और सैद्धांतिक होने चाहिए न कि निजी राय से प्रभावित होने चाहिए. सबरीमाला विवाद अब मंदिर में एंट्री से आगे बढ़कर धार्मिक स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा की सीमाएं ज़रूरी धार्मिक रीति-रिवाज और संवैधानिक नैतिकता जैसे बुनियादी संवैधानिक मुद्दों पर बड़ी बहस तक पहुंच गया है.

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Written By: Divyanshi Singh
Last Updated: 2026-04-07 12:44:14

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Sabarimala Case: केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने वाले 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर रिव्यू पिटीशन का पुरजोर समर्थन किया है. आज की सुनवाई से पहले सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में डिटेल में लिखित दलीलें पेश कीं जिसमें कहा गया कि यह मुद्दा सिर्फ जेंडर इक्वालिटी के बारे में नहीं है बल्कि यह धार्मिक आस्था, परंपरा और सांप्रदायिक स्वायत्तता से गहराई से जुड़ा हुआ है. केंद्र सरकार ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के जरिए दायर एक हलफनामे में साफ किया कि धार्मिक प्रथाओं को तर्कसंगतता, आधुनिकता या वैज्ञानिकता के आधार पर आंकना न्यायिक दखलअंदाजी होगी. सरकार का रुख अब पूरी तरह साफ है.

‘धर्म की व्याख्या अदालतों का काम नहीं’

केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि अगर कोर्ट तर्कसंगतता या आधुनिकता जैसे क्राइटेरिया के आधार पर धार्मिक प्रथाओं का रिव्यू करते हैं, तो वे धर्म पर अपने फिलोसोफिकल विचार थोप रहे होंगे जो संविधान के खिलाफ है. सरकार ने जोर देकर कहा कि यह तय करना कि कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत है या नहीं संवैधानिक रिव्यू का हिस्सा नहीं हो सकता. जज न तो धार्मिक ग्रंथों का मतलब निकालने या धार्मिक सवालों पर फैसला करने के लिए ट्रेंड हैं और न ही संस्थागत रूप से सक्षम हैं. ज़

केंद्र सरकार ने “ज़रूरी धार्मिक रीति-रिवाज” के सिद्धांत पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि किसी रीति-रिवाज की ज़रूरत तय करने का अधिकार कोर्ट के बजाय संबंधित धार्मिक पंथ के पास होना चाहिए. सरकार ने तर्क दिया कि कोर्ट को तभी दखल देना चाहिए जब कोई रीति-रिवाज पब्लिक ऑर्डर, हेल्थ, नैतिकता या बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करता हो.

‘भेदभाव नहीं बल्कि धार्मिक परंपरा का हिस्सा’

केंद्र सरकार ने कहा कि सबरीमाला में भगवान अयप्पा की पूजा “नैष्ठिक ब्रह्मचारी” के रूप में की जाती है. महिलाओं खासकर प्रजनन उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर रोक इसी धार्मिक रूप से जुड़ी है. सरकार ने साफ किया कि यह भेदभाव नहीं है, बल्कि धार्मिक परंपरा का हिस्सा है और देवता के गुणों और रूप की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती. देवता की कानूनी पहचान को मान्यता दी गई है और इसलिए देवता की व्याख्या को आखिरी माना जाना चाहिए.

2018 के फैसले और संवैधानिक नैतिकता पर सवाल

केंद्र सरकार ने 2018 के पांच जजों की बेंच के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य की जांच की गई जिससे कोर्ट धार्मिक झगड़ों का धार्मिक आर्बिटर बन गया. सरकार ने संवैधानिक नैतिकता के कॉन्सेप्ट को भी अस्पष्ट और ज्यूडिशियरी द्वारा बनाया गया बताया. केंद्र का तर्क है कि संविधान में इसका कोई साफ आधार नहीं है और यह कोर्ट को धार्मिक परंपराओं को बदलने की इजाजत देता है, जो ज्यूडिशियल इंटरप्रिटेशन के जरिए संवैधानिक संशोधन के बराबर है.

जोसेफ शाइन फैसले पर आपत्तियां

केंद्र ने जोसेफ शाइन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) फैसले पर भी सवाल उठाए हैं, जिसने एडल्टरी को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था. सरकार ने कोर्ट से इस फैसले को कानून की नजर में गलत घोषित करने की अपील की है क्योंकि यह संवैधानिक नैतिकता की बहुत ज्यादा और अपनी-अपनी सोच पर आधारित इंटरप्रिटेशन पर भी निर्भर करता है.

केंद्र ने चेतावनी दी कि संवैधानिक फैसले संविधान पहले के फैसलों और स्थापित कानूनी सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए. जजों के भाषण, लेख या निजी विचार बाहरी और बदलते विचार होते हैं, जिन्हें अदालती फैसलों का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए. आर्टिकल 129 और 141 का हवाला देते हुए सरकार ने तर्क दिया कि अदालती फैसले संस्थागत और सैद्धांतिक होने चाहिए न कि निजी राय से प्रभावित होने चाहिए. सबरीमाला विवाद अब मंदिर में एंट्री से आगे बढ़कर धार्मिक स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा की सीमाएं ज़रूरी धार्मिक रीति-रिवाज और संवैधानिक नैतिकता जैसे बुनियादी संवैधानिक मुद्दों पर बड़ी बहस तक पहुंच गया है.

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