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Shiv का त्रिशूल है सत्व, रज और तम गुणों का प्रतीक

स्वामी सुखबोधानंद शिव के पास एक त्रिशूल है जो तीन गुणों-सत्त्व, रज और तम – गुणों का प्रतीक है। सत्त्व एक विशुद्ध गुणवत्ता है, रजोगुण कार्य-कलाप से जुड़ा है जहां अहम एक भूमिका निभाता है,तमोगुण अंधकार, आलस्य है। तीनों गुणो की अपनी अपनी एक भूमिका है, लेकिन किसी भी एक का शिकार  मत बनो। तुम […]

BY: Sameer Saini • UPDATED :
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स्वामी सुखबोधानंद
शिव के पास एक त्रिशूल है जो तीन गुणों-सत्त्व, रज और तम – गुणों का प्रतीक है। सत्त्व एक विशुद्ध गुणवत्ता है, रजोगुण कार्य-कलाप से जुड़ा है जहां अहम एक भूमिका निभाता है,तमोगुण अंधकार, आलस्य है। तीनों गुणो की अपनी अपनी एक भूमिका है, लेकिन किसी भी एक का शिकार  मत बनो। तुम सोते हो तो यह तमो गुण है, नींद तुम्हारे नित्य कर्म का हिस्सा होना चाहिये, लेकिन मेरी बात सुनते वक्त नहीं।
अपने गुणों पर नियंत्रण रखो से मेरा तात्पर्य यही है।रजो गुण क्रियाशीलता का चिन्ह है, अत: तुम्हे सक्रियरूप से ध्यान मे बैठना चाहिये। लेकिन ध्यान के दौरान अपना सिर खुजलाना क्रियाशीलता नहीं है। रजो गुण को यहां गलत जगह पर रखा गया है। इन भूमिकाओं को सही स्थानों पर क्रमानुसार निभाना चाहिये। कुछ लोगों  के लिये सत्त्व गुण का मतलब शुद्धता की लत लगाना है। चार लोग एक नाव में थे। किनारे पर पहुंचने जाने के बाद  वे नाव को अपने सिरों पर रख कर अपने साथ ले गये। एक भिक्षु ने उनसे पूछा,  तुम नाव को क्यों लाद कर ले जा रहे हो? उन्होने कहा,  नाव ने  नदी पार करने में हमारी सहायता की है। हम इसने कृतज्ञ हैं कि हम जहां भी जाते हैं इसको साथ लेकर जाते हैं।
लेकिन इस्तेमाल करने के बाद नाव को लाद कर इधर उधर ले जाने के बजाय किनारे पर लंगर डालकर रख देना चाहिये। नहीँ तो कृतज्ञता एक प्रकार की दासता बन जाती है। अगर आप ने जनेऊ पहना है तो परंपरा के अनुसार जब आप संन्यास ग्रहण करते हैँ तो आपको उसे तोड़ कर फेक देना होता है। ऐसा करना मुश्किल लगता है क्योंकि आप अब तक जनेऊ पहन कर गायत्री मंत्र का जाप करते रहे हैं। संन्यास लेने पर आपको अचानक जनेऊ को तोड़ कर फेक देना होता है! उस मोह का भी त्याग करना होगा। अच्छे और बुरे दोनों ही के प्रति मोह को छोड़ना होगा।
बुद्ध ने कहा है कि कृतज्ञता सुंदर है, लेकिन कृतज्ञता के नाम पर नाव वालो की तरह नाव लाद कर घूमने की मूर्खता मत करो। तब नाव नौयात्रा का एक साधन बनने के बजाय एक बोझ बन जाती है। अत: तीनों गुणों के स्वामी बनो। छोड़ना सीखो, त्रिशूल का अर्थ यही है। त्रिशूल के ऊपर क्या है? उसके साथ एक डमरू बंधा हुआ है। लगता है कि संस्कृत की समस्त व्याकरण डमरू से निकली है। पाणिनि व्याकरण सूत्र लिखना चाहते थे। इस उद्देश्य से वह ध्यान में लगे थे। उनके दिमाग का अन्तज्ञार्नी चतुर्थांश (क्वाड्रैण्ट) खुल गया। लगता है कि वे संध्याकाल के दौरान शिव के ब्रह्माण्डीय नृत्य मे लीन हो गये थे। शिव के नृत्य के साथ डमरू की ध्वनि से पाणिनि ने व्याकरण सूत्रों की रचना की। शिव के नृत्य के समय पणिनि को विचार कहां से मिला?
आप वेब या रेडियो या दूरदर्शन के प्रसारण पर कैसे पहुंचते हैं। तभी जब आपके पास साधन या रिसीवर होता है। अध्ययन दिखलाते हैं कि एक बार जब संगीत की रचना की जा चुकती है तो वह मौजूद रहता है – अंतर्ध्यान नहीं होता है। ऊर्जा को नष्ट नहीं किया जा सकता है। वह किसी न किसी रूप में मौजूद रहती है। बात कुल इतनी है कि हमारे पास अभी तुरन्त इन पहले से मौजूद ऊजार्ओं के आविष्कार का उपकरण नहीं  हैं।
अत: ध्यान उसीका एक उपकरण है और उस उपकरण में तुम्हारे अंतर्ज्ञान के रिसेप्टर (अभिग्राहक) हैं, जिसे विज्ञान में तुम्हारे दिमाग के डी क्वाड्रैंट (चतुर्थांश) कहा जाता है। दिमाग के चार चतुर्थांशों मेँ तर्क का :अ, योजना का :इ, गतिरोधन (काइनिस्थेटिक) और खिलवाड़ का उ और अंतर्ज्ञान का ऊ। शोध से पता चलता है कि जब तुम ध्यान लगाते हो तब दिमाग की अंतर्ज्ञान की कोशिकायें खुल जाती हैं। अन्य लोग जितना देख सकते हैं तब तुम उससे कहीं ज्यादा देखते हो। इसीलिये चूहे को देखर वाल्ट डिज्नी ने मिकी माउस की रचना की। किसी और ने उजाड़ की ओर देखा और समृद्ध मुबंई खड़ी कर दी।

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