Koovagam Festival: क्या आप जानते हैं कि एक ऐसा महोत्सव होता है, जिसमें 18 दिनों का अनुष्ठान किया जाता है. ये महाभारत की एक पौराणिक कथा पर निर्भर है. इस फेस्टिवल का नाम कूवगम फेस्टिवल है, जिसमें ट्रांसजेंडर महिलाएं अपने देवता अरवन से विवाह करती हैं. ये त्योहार हर साल तमिल महीने चिथिरईइ के दौरान मनाया जाता है, जो अप्रैल और मई के बीच में पड़ता है. ये ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण वार्षिक उत्सव है, जो 15-18 दिनों तक चलता है. ट्रांसजेंडर्स ये उत्सव भगवान अरावन को समर्पित करते हैं. ट्रांसजेंडर लोग महाभारत की कथा से प्रेरित होकर शादी और विधवा होने के अनुष्ठान करते हैं.
कहां आयोजित होता है महोत्सव?
बता दें कि कूवगम महोत्सव तमिलनाडु के कल्लाकुरिची जिले के कूवगम गांव में आयोजित किया जाता है और लगभग 18 दिन चलता है. ये दुनिया का सबसे बड़ा ट्रांसजेंडर उत्सव माना जाता है.
क्या है महाभारत की कथा?
कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के दौरान पांडवों की जीत सुनिश्चित करने के लिए देवता अरवन ने अपनी बलि दी थी. देवता अरवन को अर्जुन का पुत्र बताया जाता है. बलिदान से पहले उनकी अंतिम इच्छा थी कि उन्हें विवाह करना है. कोई भी महिला शादी के अगले दिन विधवा नहीं होना चाहती थी. इसलिए किसी ने भी ये जानते हुए उनसे विवाह नहीं किया.
भगवान श्रीकृष्ण ने किया था विवाह
इसके पबाद भगवान श्रीकृष्ण ने मोहिनी का रूप धारण करके देवता अरवन से विवाह किया. इसी परंपरा को निभाते हुए ट्रांसजेंडर महिलाएं खुद को मोहिनी का रूप मानकर देवता अरवन से विवाह करती हैं. बता दें कि ट्रांसजेंडर महिलाओं को अरवानी या थिरुनंगी भी कहा जाता है.
कैसे होती है देवता अरवन से शादी?
इस महोत्सव के 17वें दिन मंदिर के पुजारी ट्रांसजेंडर महिलाओं के गले में मंगलसूत्र बांधते हैं. इस तरह से वे प्रतीकात्मक रूप से भगवान अरवन की पत्नी बन जाती हैं. इस दिन नाचना-गाना, खाना-पीना और नाच-गाना भी होता है.
18वें दिन विधवा हो जाती हैं किन्नर
विवाह के अगले दिन यानी 18वें दिन प्रतीकात्मक रूप से भगवान अरवन की बलि दी जाती है. इसके बाद सभी ट्रांसजेंडर महिलाएं पति की मृत्यु का शोक मनाती हैं. अपनी चूड़ियां तोड़ देती हैं और मंगलसूत्र उतारकर सफेद कपड़े पहनकर दुख मनाती हैं.